क्यों होती है छठ पूजा

!!छठ महापर्व कि अशेष शुभकामनाएं!!

 छठ पूजा का पर्व सूर्य देव की आराधना के लिए मनाया जाता है। यह पर्व साल में दो बार, चैत्र शुक्ल षष्ठी आैर कार्तिक शुक्ल षष्ठी तिथियों को मनाया जाता है। इनमे से कार्तिक की छठ पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। चार दिनों तक चलने वाले इस पर्व को छठ पूजा, डाला छठ, छठी माई, छठ, छठ माई पूजा, सूर्य षष्ठी पूजा आदि कई नामों से बुलाया जाता है।

क्यों होती है छठ पूजा

शास्त्रों के अनुसार छठ पूजा आैर उपवास मुख्य रूप से सूर्य देव की अाराधना से उनकी कृपा पाने के लिये होता है। एेसी मान्यता है कि सूर्य देव की कृपा हो जाये तो सेहत अच्छी रहती है, आैर धन-धान्य के भंडार भरे रहते हैं। एेसा भी कहा जाता है कि छठ माई की कृपा से संतान प्राप्त होती। ये व्रत रखने से सूर्य के समान तेजस्वी आैर आेजस्वी संतान के लिये भी रखा जाता है। इस पूजा आैर उपवास से मनोकामनाओं की पूर्ति होती है।

षष्ठी की कथा

छठ माता को सूर्य देव की बहन माना जाता है। वहीं छठ व्रत की एक कथा के अनुसार छठ देवी को ईश्वर की पुत्री देवसेना माना गया है। देवसेना के बारे में बताते हुए कर्इ स्थान पर उन्हीं के हवाले से कहा गया कि वह प्रकृति की मूल प्रवृति के छठवें अंश से उत्पन्न हुई हैं यही कारण है कि वे षष्ठी कहलार्इं। कार्तिक शुक्ल षष्ठी को उनकी आराधना करने वालों को विधि विधान से पूजा करने पर संतान प्राप्ति होती है।

श्री राम से भी है संबंध

पौराणिक कथाआें की माने तो एेसा कहा जाता है कि रामायण काल में भगवान श्री राम ने अयोध्या वापस आने के बाद सीता जी के साथ कार्तिक शुक्ल षष्ठी को सूर्योपासना की थी। इसी तरह महाभारत काल में कुंती द्वारा विवाह से पूर्व सूर्योपासना करके पुत्र प्राप्ति करने से भी इस दिन को जोड़ा जाता है। कहते हैं कि कर्ण का जन्म इसी प्रकार हुआ था।

चार दिन की पूजा

छठ पूजा चार दिनों तक चलती है जो इस बार 11 नवंबर 2018 से प्रारंभ होगी आैर 14 नवंबर 2018 तक चलेगी आैर उसका क्रम इस प्रकार रहेगा।

रविवार 11 नवंबर 2018 नहाय-खाय

सोमवार 12 नवंबर 2018 खरना

मंगलवार 13 नवंबर 2018 संध्या अर्ध्य

बुधवार 14 नवंबर 2018 सूर्योदय/ऊषा अर्ध्य आैर पारण

पहला दिन नहाय खाय- छठ पूजा का मुख्य त्यौहार कार्तिक शुक्ल षष्ठी को मनाया जाता है, लेकिन चतुर्थी को नहाय खाय के साथ इसका प्रारंभ हो जाता है। इस दिन प्रात काल स्नान करके नये वस्त्र पहनते है। और शाकाहारी भोजन करते हैं। घर में जो व्यक्ति व्रत करता है परिवार के बाकी सदस्य उसके खाना खाने के बाद ही भोजन करते हैं।

दूसरा दिन खरना- ये कार्तिक शुक्ल पंचमी को होता है आैर इसमें पूरे दिन व्रत रख कर शाम को भोजन ग्रहण करते हैं। इसे खरना कहा जाता है। इस दिन निर्जल उपवास किया जाता है। शाम को गुड़ से बनी चावल की खीर बनार्इ जाती है, आैर नमक व चीनी दोनों का प्रयोग वर्जित होता है। इसी दिन चावल का पिठ्ठा व घी लगी रोटी का भी प्रसाद बनता है।

तीसरे दिन छठ पूजा- इस दिन मुख्य छठ पूजा होती है। जिसमें विशेष प्रसाद बनाया जाता है। जिसमें ठेकुआ का खास महत्व होता है, जिसे टिकरी भी कहा जाता है। चावल के लड्डू भी बनते हैं। इसके बाद प्रसाद व फल को बांस की टोकरी में सजाया जाता है। इस टोकरी की पूजा कर व्रत करने वाले सूर्य को अर्घ्य देने के लिये तालाब आैर नदी के तट पर जाते हैं, जहां स्नान करके अस्त होते सूर्य की आराधना की जाती है।

चौथा दिन पारण- छठ पूजा के चौथे आैर अंतिम दिन यानि सप्तमी को सुबह सूर्योदय के समय भी सूर्यास्त वाली उपासना की विधि दोहरार्इ जाती है। इसके बाद विधिवत पूजा कर प्रसाद बांट जाता है। इसके बाद सूर्य को अर्ध्य देकर छठ पूजा का पारण किया जाता हैं।
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