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Showing posts from November, 2019

Marriage & sexual life. [Post 3]

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 पुरुषों की कुंडलियों में सातवें भाव का स्वामी बहुत बलवान और पाप ग्रहों से अदृष्ट होना चाहिए। सातवे  भाव का स्वामी के स्वामी से केन्द्र स्थान अग्नि तत्त्व वाला ग्रह नहीं होना चाहिए। सातवे भाव का कारक शुक्र भी पाप ग्रहों से दृष्ट एवम मंगल या शनि से घिरा रहना भी सुखी विवाहित जीवन की दृष्टि से ठीक नहीं है।           शुक्र का सातवें भाव के स्वामी के साथ होना सुखी विवाहित जीवन प्रकट करता है, लेकिन यहां अगर सप्तम भाव का स्वामी सूर्य, मंगल और शनि हो तो यह बात पूर्णतया लागू नहीं होगी, बल्कि वैवाहिक जीवन दुःखपूर्ण भी हो सकता है।     और आगे की जानकारी के लिए फॉलो करें तकी हमारी नए नए पोस्ट की नोटिफिकेशन आप तक आसानी से मिलसके,      @follow me                     

Marriage and sexual life [Post- 2]

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                           जी हाँ , आपने मेरे पहले पोस्ट जैसा की पढ़े और समझे है, आज फिर हम उसी विषय पर                                    अपनी नयी और दूसरी आर्टिकल प्रस्तुत कर रहें हैं।  पहली और सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात यह है की हमे वर और वधु की अलग - अलग विशेस्ताओ की जाँच उनकी कुंडली के आधार पर करनी चाहिए।  पुरुष की कुंडली में उसकी आयु उसका सातवाँ भाव एवं विवाह और उसके बाद में आने वाली दसा -अन्तर्दशा का अध्ययन आवश्यक है।  आयु के लिए ग्रहयोग और दसा  दोनों प्रकार  विचार करना चाहिए।               अकाल मृत्यु , दुर्घटना , हृदयावरोध आदि अशुभ और मारक दशाओ में घटित होते है। प्राचीन भारतीय संस्कृत ग्रन्थों में 'कलत्र दोष '    से योग मिलते है ,  पुरुष की कुंडली में उनका परिहार आवश्यक है।  इस आर्टिकल का संकेड़ पार्ट के लिए आप हमे कमेंट में बताय और आपको यह पोस्ट कैसा लगा यह भी बताने की कृपा करें         धन्यबाद।     http://www.narayanjyotishparamarsh.com

विवाह और यौन जीवन

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भारतीय समाज में विवाह अत्यंत महवपूर्ण धार्मिक एवं आवश्यक संस्कार है।       बहुत प्राचीन समय से विवाह के लिए कुंडलियों का मिलान करने की प्रथा चली आरही है।      इस प्रथा का आशय केवल परम्परा का निर्वाह ही नहीं हैं , अपितु गुण -धर्म -स्व्भाव और प्रकृति के अनुरूप उपुक्त जीवन -साथी की खोज भी है।                                         भारतीय ज्योतिष नक्षत्र , योग , ग्रह राशि अदि तत्वों के आधार पर व्यक्ति के स्व्भाव व गुण  का निस्चय करता है और बतलाता है की अमुक नक्षत्र ,ग्रह और राशि के प्रभाव में उत्पन्न नारी के साथी संबन्ध करना अनुकूल है। इस प्रकार कुंडलियों के मिलान की यह प्रथा वैज्ञानिक और व्यावहारिक दृस्टि से  अत्यंत उपयुक्त और प्रभावसाली है।                                  भारतीय ज्योतिष मे जन्म-नक्षत्र के चरणों के आधारों पर कुंडली मिलान की परम्परा चली आरही है। प्रत्येक प्रान्त और भासा के पञ्चांग में इससे संबधित चक्र और सरणिया बनी होती हैं , और सामान्य जानकारी रखने वाले ज्योतिष -प्रेमी  भी सरलता से वर -बधु  के पारस्परिक गुणों का पता लगा सकते हैं।    प्रस्तुत अध्याय में क

शक्ति और आरोग्य के देवता हैं सूर्य देव

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🌹🕉श्री भुवन भाष्करायनमः🌹      भगवान सूर्य की साधना,आराधना एवं अर्चना के परम पवित्र एवं अक्षय फलदायी पर्व "सूर्य षष्ठी" के पावन उपलक्ष्य पर दो शब्द..................... ----------------------------------------    शक्ति और आरोग्य के देवता हैं सूर्य देव-- ----------------------------------------      🌷वैदिक काल से भगवान सूर्य की उपासना का उल्लेख मिलता है। सूर्य को वेदों में जगत की आत्मा और ईश्वर का नेत्र बताया गया है। सूर्य को जीवन, स्वास्थ्य एवं शक्ति के देवता के रूप में मान्यता हैं। सूर्यदेव की कृपा से ही पृथ्वी पर जीवन बरकरार है। ऋषि-मुनियों ने उदय होते हुए सूर्य को ज्ञान रूपी ईश्वर बताते हुए सूर्य की साधना-आराधना को अत्यंत कल्याणकारी बताया है। प्रत्यक्ष देवता सूर्य की उपासना शीघ्र ही फल देने वाली मानी गई है। जिनकी साधना स्वयं प्रभु श्री राम ने भी की थी। विदित हो कि प्रभु श्रीराम के पूर्वज भी सूर्यवंशी थे। भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र सांब भी सूर्य की उपासना करके ही कुष्ठ रोग दूर कर पाए थे।     सूर्य की साधना का महत्व - -----------------------------------