Tuesday, December 10, 2019

शादी और बुध ग्रह

बुध भी विवाह के मामले में चुप नहीं हैं श्री एच. भूतलिंगम ने अपने एक लेख में लिखा है कि यदि बुध सातवे भाव में गुलिक के साथ बैठा हुआ हो एवम उसे शनि और मंगल देखते हो तो जातक अथवा जतिका का विवाहित जीवन बहुत दुःखी होता है। यदि इस विशेष योग में बुध बढ़काधिपती भी भयंकर हो तो यह योग और भी भयंकर हो जाता है। ऐसी अवस्था में एक साथी (स्त्री या पुरूष) बीमारी और दुःख के कारण पागल तक हो जाता है।

   महिलाओं की कुंडली में आठवें भाव, उसके स्वामी की स्थिति, कारक शुक्र आदि के बलवान का विचार करना चाहिए।
उनकी लग्न बलवान होना एवं जल तत्व की राशि का होना उयुक्त होता है। 'कुल दोष' के अलावा उनकी कुंडलियों में द्व्तीय स्थान {लग्न से} शुक्र से द्वित्य स्थान, चन्द्रमा से  द्वितीय स्थान एवं सप्तमेश इ द्वितीय स्थान में पाप गृह नहीं होने चाहिए। 

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Friday, November 29, 2019

Marriage & sexual life. [Post 3]

 पुरुषों की कुंडलियों में सातवें भाव का स्वामी बहुत बलवान और पाप ग्रहों से अदृष्ट होना चाहिए। सातवे  भाव का स्वामी के स्वामी से केन्द्र स्थान अग्नि तत्त्व वाला ग्रह नहीं होना चाहिए। सातवे भाव का कारक शुक्र भी पाप ग्रहों से दृष्ट एवम मंगल या शनि से घिरा रहना भी सुखी विवाहित जीवन की दृष्टि से ठीक नहीं है।
   
      शुक्र का सातवें भाव के स्वामी के साथ होना सुखी विवाहित जीवन प्रकट करता है, लेकिन यहां अगर सप्तम भाव का स्वामी सूर्य, मंगल और शनि हो तो यह बात पूर्णतया लागू नहीं होगी, बल्कि वैवाहिक जीवन दुःखपूर्ण भी हो सकता है।
   और आगे की जानकारी के लिए फॉलो करें तकी हमारी नए नए पोस्ट की नोटिफिकेशन आप तक आसानी से मिलसके, 
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Thursday, November 21, 2019

Marriage and sexual life [Post- 2]



                           जी हाँ , आपने मेरे पहले पोस्ट जैसा की पढ़े और समझे है, आज फिर हम उसी विषय पर                                    अपनी नयी और दूसरी आर्टिकल प्रस्तुत कर रहें हैं। 
पहली और सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात यह है की हमे वर और वधु की अलग - अलग विशेस्ताओ की जाँच उनकी कुंडली के आधार पर करनी चाहिए।  पुरुष की कुंडली में उसकी आयु उसका सातवाँ भाव एवं विवाह और उसके बाद में आने वाली दसा -अन्तर्दशा का अध्ययन आवश्यक है।  आयु के लिए ग्रहयोग और दसा  दोनों प्रकार  विचार करना चाहिए।
              अकाल मृत्यु , दुर्घटना , हृदयावरोध आदि अशुभ और मारक दशाओ में घटित होते है। प्राचीन भारतीय संस्कृत ग्रन्थों में 'कलत्र दोष '  से योग मिलते है ,  पुरुष की कुंडली में उनका परिहार आवश्यक है। 
इस आर्टिकल का संकेड़ पार्ट के लिए आप हमे कमेंट में बताय और आपको यह पोस्ट कैसा लगा यह भी बताने की कृपा करें 
       धन्यबाद। 

Tuesday, November 19, 2019

विवाह और यौन जीवन

भारतीय समाज में विवाह अत्यंत महवपूर्ण धार्मिक एवं आवश्यक संस्कार है। 
     बहुत प्राचीन समय से विवाह के लिए कुंडलियों का मिलान करने की प्रथा चली आरही है।
     इस प्रथा का आशय केवल परम्परा का निर्वाह ही नहीं हैं , अपितु गुण -धर्म -स्व्भाव और प्रकृति के अनुरूप उपुक्त जीवन -साथी की खोज भी है।

                                        भारतीय ज्योतिष नक्षत्र , योग , ग्रह राशि अदि तत्वों के आधार पर व्यक्ति के स्व्भाव व गुण  का निस्चय करता है और बतलाता है की अमुक नक्षत्र ,ग्रह और राशि के प्रभाव में उत्पन्न नारी के साथी संबन्ध करना अनुकूल है। इस प्रकार कुंडलियों के मिलान की यह प्रथा वैज्ञानिक और व्यावहारिक दृस्टि से  अत्यंत उपयुक्त और प्रभावसाली है। 
               
                भारतीय ज्योतिष मे जन्म-नक्षत्र के चरणों के आधारों पर कुंडली मिलान की परम्परा चली आरही है।
प्रत्येक प्रान्त और भासा के पञ्चांग में इससे संबधित चक्र और सरणिया बनी होती हैं , और सामान्य जानकारी रखने वाले ज्योतिष -प्रेमी  भी सरलता से वर -बधु  के पारस्परिक गुणों का पता लगा सकते हैं।

   प्रस्तुत अध्याय में कुंडलीयो के मिलान की इस प्रथा के साथ - साथ  कुछ अन्य सरल , परन्तु अनुभूत और प्रभावशाली बातों का विवचेना भी किया जारहा है। 
      इस आर्टिकल का संकेड़ पार्ट के लिए आप हमे कमेंट में बताय और आपको यह पोस्ट कैसा लगा यह भी बताने की कृपा करें 
       धन्यबाद। 

Friday, November 1, 2019

शक्ति और आरोग्य के देवता हैं सूर्य देव

🌹🕉श्री भुवन भाष्करायनमः🌹
     भगवान सूर्य की साधना,आराधना एवं अर्चना के परम पवित्र एवं अक्षय फलदायी पर्व "सूर्य षष्ठी" के पावन उपलक्ष्य पर दो शब्द.....................
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   शक्ति और आरोग्य के देवता हैं सूर्य देव--
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     🌷वैदिक काल से भगवान सूर्य की उपासना का उल्लेख मिलता है। सूर्य को वेदों में जगत की आत्मा और ईश्वर का नेत्र बताया गया है। सूर्य को जीवन, स्वास्थ्य एवं शक्ति के देवता के रूप में मान्यता हैं। सूर्यदेव की कृपा से ही पृथ्वी पर जीवन बरकरार है। ऋषि-मुनियों ने उदय होते हुए सूर्य को ज्ञान रूपी ईश्वर बताते हुए सूर्य की साधना-आराधना को अत्यंत कल्याणकारी बताया है। प्रत्यक्ष देवता सूर्य की उपासना शीघ्र ही फल देने वाली मानी गई है। जिनकी साधना स्वयं प्रभु श्री राम ने भी की थी। विदित हो कि प्रभु श्रीराम के पूर्वज भी सूर्यवंशी थे। भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र सांब भी सूर्य की उपासना करके ही कुष्ठ रोग दूर कर पाए थे।

    सूर्य की साधना का महत्व -
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     भगवान भास्कर यानी सूर्यदेव की साधना-आराधना का अक्षय फल मिलता है। सच्चे मन से की गई साधना से प्रसन्न होकर भगवान भास्कर अपने भक्तों को सुख-समृद्धि एवं अच्छी सेहत का आशीर्वाद प्रदान करते हैं। ज्योतिष के अनुसार सूर्य को नवग्रहों में प्रथम ग्रह और पिता के भाव कर्म का स्वामी माना गया है। जीवन से जुड़े तमाम दुखों और रोग आदि को दूर करने के साथ-साथ जिन्हें संतान नहीं होती उन्हें सूर्य साधना से लाभ होता हैं। पिता-पुत्र के संबंधों में विशेष लाभ के लिए सूर्य साधना पुत्र को करनी चाहिए।

इस विधि से करें सूर्य की साधना-
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    सनातन परंपरा में प्रत्यक्ष देवता सूर्य की साधना-उपासना शीघ्र ही फल देने वाली मानी गई है। सूर्यदेव की पूजा के लिए सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करें। इसके पश्चात् उगते हुए सूर्य का दर्शन करते हुए उन्हें ॐ घृणि सूर्याय नम: कहते हुए जल अर्पित करें। सूर्य को दिए जाने वाले जल में लाल रोली, लाल फूल मिलाकर जल दें। सूर्य को अर्घ्य देने के पश्चात्प लाल आसन में बैठकर पूर्व दिशा में मुख करके सूर्य के मंत्र का कम से कम 108 बार जप करें।

  उगते ही नहीं डूबते सूर्य को भी देते हैं अर्घ्य -
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    सूर्यदेव की न सिर्फ उदय होते हुए बल्कि अस्त होते समय भी की जाती है। भगवान भास्कर की डूबते हुए साधना सूर्य षष्ठी के पर्व पर की जाती है। जिसे हम छठ पूजा के रूप में जानते हैं। इस दिन सूर्य देवता को अघ्र्य देने से इस जन्म के साथ-साथ, किसी भी जन्म में किए गए पाप नष्ट हो जाते हैं। अस्त हो रहे सूर्य को पूजन करने के पीछे ध्येय यह भी होता है कि — ‘हे सूर्य देव, आज शाम हम आपको आमंत्रित करते हैं कि कल प्रातःकाल का पूजन आप स्वीकार करें और हमारी मनोकामनाएं पूरी करें।

     भगवान सूर्य की साधना एवं पूजा-अर्चना तीनों पहरों में करनी चाहिए -
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    सूर्य की दिन के तीन प्रहर की साधना विशेष रूप से फलदायी होती है।
1. प्रातःकाल के समय सूर्य की साधना से आरोग्य की प्राप्ति होती है।
2. दोपहर के समय की साधना साधक को मान-सम्मान में वृद्धि कराती है।
3. संध्या के समय की विशेष रूप से की जाने वाली सूर्य की साधना सौभाग्य को जगाती है और संपन्नता लाती है।

   सूर्य के इस मंत्र से पूरी होगी मनोकामना -
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    सूर्य की साधना में मंत्रों का जप करने पर मनोकामनाएं शीघ्र पूर्ण होती है। सुख-समृद्धि और अच्छी सेहत का आशीर्वाद प्राप्त होता है। तमाम तरह की बीमारी और जीवन से जुड़े अपयश दूर हो जाते हैं। सूर्य के आशीर्वाद से आपके भीतर एक नई ऊर्जा का संचार होता है।

     जीवन में सुख-समृद्धि और सफलता दिलाने वाले सूर्य मंत्र इस प्रकार हैं - 
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"एहि सूर्य सहस्त्रांशो तेजोराशे जगत्पते।
अनुकम्पय मां भक्त्या गृहणाध्र्य दिवाकर।।"

"ॐ घृणि सूर्याय नमः।।"

"ॐ ऐहि सूर्य सहस्त्रांशों तेजो राशे जगत्पते। अनुकंपय मां भक्त्या ग्रहणार्घ्यं  दिवाकर।।"

ॐ ह्रीं घृणिः सूर्य आदित्यः क्लीं ॐ।।"

अधिक जानकारी हेतु संपर्क करें।
और आप को आज कि आर्टिकल कैसा लगा हमें कॉमेंट बॉक्स में जरूर लिखें। 
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        🌷भगवान सूर्य आप सभी का सर्वत्र मंगल करें 🌹

Friday, October 25, 2019

दीपावली के आश्चर्य जनक टोटके


दोस्तों इस बार दीपावली के अवसर पर कुछ छोटे छोटे टोटके(उपाय) करिये और इनका आश्चर्य जनक परिणाम स्वयं देखिये।

1-दीपावली के पांच पर्व होते हैं (धनतेरस, चर्तुदशी, दीपावली, गोवर्धन पूजा, यम द्वितीया)। पांचों दिन दीपक (चार छोटे एक बड़ा) जरुर जलाएं। दीपक रखने से पहले आसन बिछाएं फिर खील, चावल रखें तथा उस पर दीपक रखें। धन की वृद्वि सदा बनी रहेगी।
2-यदि कमाई का कोई जरिया न हो, तो एक गिलास कच्चे दूध में, चीनी डाल कर जामुन वृक्ष की जड़ में चढ़ाएं। यह क्रिया धनतेरस से शुरू करें और चालीस दिन लगातार करें। कभी-कभी सफाई कर्मचारी को चाय की 250  ग्राम पत्ती या सिगरेट दान करें।
3-आपका व्यवसाय यदि कम हो गया हो या किसी ने उसे बाँध दिया हो, तो दीपावली से पूर्व धनतेरस के दिन पूजा स्थल पर लाल वस्त्र बिछाकर उस पर 'धनदा यन्त्र' को स्थापित करें और धूप, दीप दिखाएं, नैवेघ अर्पित करें, यह क्रिया करते समय मन ही मन श्रीं श्रीं मंत्र का जप करते रहें. प्रतिदिन नहा धोकर यन्त्र का निष्ठापूर्वक दर्शन करें।
4-दीपावली के दिन सुबह तुलसी की माला बना कर मां लक्ष्‍मी के चरणों में चढ़ा दें, इससे आपको धन की बरकत होगी।
5-दीपावली की रात लक्ष्मी पूजन के साथ एकाक्षी नारियल की स्थापना कर उसकी पूजन-उपासना करें।भाई दूज के दिन लाल कपडे में लपेट कर साल भर तिजोरी में रखे इससे धन लाभ होता है साथ ही परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।
6-दूध से बने नैवेद्य मां लक्ष्मी को अति प्रिय हैं। इसलिए उन्हें दूध से निर्मित मिष्ठान जैसे- खीर, रबड़ी आदि का भोग लगाएं। इससे मां लक्ष्मी शीघ्र प्रसन्न होती हैं।
7-दीपावली की रात लक्ष्मी पूजन के साथ-साथ काली हल्दी का भी पूजन करें और यह काली हल्दी अपने धन स्थान(लॉकर, तिजोरी) आदि में रखें। इससे धन लाभ होगा।
8-धन-समृद्धि के लिए दीपावली की रात में केसर से रंगी नौ कौडिय़ों की भी पूजा करें। पूजन के पश्चात इन कौडिय़ों को पीले कपड़े में बांधकर पूजास्थल पर रखें। ये कौडिय़ां अपने व्यापार स्थल पर रखने से व्यापार में वृद्धि होती है।
9-दीपावली के दिन मां लक्ष्‍मी को पूए का भोग लगा कर उसे गरीबों में बांटने से चढ़ा हुआ कर्ज उतर जाता है।
10-दीपावली के दिन से कमलगट्टे की माला से निम्न महालक्ष्मी मंत्र का जप शुरू करे और प्रतिदिन करे इससे कभी भीआर्थिक समस्या नहीं होगी।
मन्त्र-'ॐ श्रीं ह्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्मयै नम:'।
11-कोर्ट कचहरी में मुकदमा चल रहा हो तो पांच गोमती चक्रों को दीपावली के दिन पूजन पर रखें. जब तारीख पर कोर्ट जाना हो तो उन्हें जेब में रख कर जाएं, जाते समय मन ही मन इश्वर से विजय की प्रार्थना करते रहें, सफलता प्राप्त होगी.
12-यदि आपका उधार लिया हुआ पैसा कोई लम्बे अरसे से नहीं लौटा रहा हो तो, दीपावली के दिन उस व्यक्ति का नाम लेकर ग्यारह गोमती चक्र पर तिलक लगा कर, इष्ट देव का स्मरण कर, उससे निवेदन करें, कि मेरा पैसा जल्द से जल्द लौटा दो. इसके बाद पूजित गोमती चक्रों को पीपल के वृक्ष के पास जमीन में दबा दें।
13-यदिआप बेरोजगार है नौकरी के तलाश में लगे है तो दीपावली के दिन पूजा करते समय पांच कोडियों पर हल्दी का तिलक लगाकर उसकी भी पूजा करे और अगले दिन अपने ऊपर से आठ बार उसारकर किसी भिखारी को कुछ पैसो के साथ दान कर दे।इससे आपको नौकरी मिलने की संभावना बढ़ जाएगा ।
14-दुर्भाग्य के नाश के लिए दीपावली की रात में एक नींबू लेकर मध्यरात्रि के समय किसी चौराहे पर जाएं वहां उस नींबू को चार भाग में काटकर चारों रास्तों पर फेंक दें।
क्यों दीपावली के दिन तंत्र मंत्र सिद्ध करने के लिए सर्वाधिक उपयुक्त होते है?
दोस्तों केवल होली और दीपावली ही ऐसे दो त्यौहार है जिसमे टोने टोटके और विभिन्न तांत्रिक क्रियाएँ संपन्न होती है।जानते है क्यों चलिए हम बताते है क्योकि दीपावली अमावस्या के दिन और होली पूर्णिमा के दिन होता है।ये दोनों तिथियों पर ही ये सब क्रियाएँ सम्पन्न होती है।


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How to please mahalakshmi?


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दीपावली पर महालक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए ये है 51 उपाय, एक उपाय जरूर अपनाएं ....

हिन्दुओं के सभी पर्वों में दीपावली का सबसे अधिक महत्तव है। इस पर्व पर धन की देवी महालक्ष्मी को प्रसन्न करने की लिए उनका पूजन किया जाता है।

यदि इस दिन सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त में सही विधि-विधान से लक्ष्मी का पूजन कर लिया जाए तो अगली दीपावली तक लक्ष्मी कृपा से घर में धन और धान्य की कमी नहीं आती है।

शास्त्रों के अनुसार कुछ ऐसे उपाय बताए गए हैं जो दीपावली के दिन करने पर बहुत जल्दी लक्ष्मी की प्रसन्नता प्राप्त की जा सकती है। यहां लक्ष्मी कृपा पाने के लिए 51 उपाय बताए जा रहे हैं

और ये उपाय सभी राशि के लोगों द्वारा किए जा सकते हैं। यदि आप चाहे तो इन उपायों में से कई उपाय भी कर सकते हैं या सिर्फ कोई एक उपाय भी कर सकते हैं।

छत्तीसगढ के ज्योतिष विद्या के जानकार मुंगेली के ज्योतिषी बता रहे है इस दीपावली क्या करे जिससे महालक्ष्मी होगी प्रसन्न।

1. दीपावली पर लक्ष्मी पूजन में हल्दी की गांठ भी रखें। पूजन पूर्ण होने पर हल्दी की गांठ को घर में उस स्थान पर रखें, जहां धन रखा जाता है।

2. दीपावली के दिन यदि संभव हो सके तो किसी किन्नर से उसकी खुशी से एक रुपया लें और इस सिक्के को अपने पर्स में रखें। बरकत बनी रहेगी।

3. दीपावली के दिन घर से निकलते ही यदि कोई सुहागन स्त्री लाल रंग की पारंपरिक ड्रेस में दिख जाए तो समझ लें आप पर महालक्ष्मी की कृपा होने वाली है। यह एक शुभ शकुन है। ऐसा होने पर किसी जरूरतमंद सुहागन स्त्री को सुहाग की सामग्री दान करें।

4. दीपावली की रात में लक्ष्मी और कुबेर देव का पूजन करें और यहां दिए एक मंत्र का जप कम से कम 108 बार करें।

मंत्र: ऊँ यक्षाय कुबेराय वैश्रववाय, धन-धान्यधिपतये धन-धान्य समृद्धि मम देहि दापय स्वाहा।

5. दीपावली पर लक्ष्मी पूजन के बाद घर के सभी कमरों में शंख और घंटी बजाना चाहिए। इससे घर की नकारात्मक ऊर्जा और दरिद्रता बाहर चली जाती है। मां लक्ष्मी घर में आती हैं।

6. महालक्ष्मी के पूजन में गोमती चक्र भी रखना चाहिए। गोमती चक्र भी घर में धन संबंधी लाभ दिलाता है।

7. दीपावली पर तेल का दीपक जलाएं और दीपक में एक लौंग डालकर हनुमानजी की आरती करें। किसी मंदिर हनुमान मंदिर जाकर ऐसा दीपक भी लगा सकते हैं।

8. रात को सोने से पहले किसी चौराहे पर तेल का दीपक जलाएं और घर लौटकर आ जाएं। ध्यान रखें पीछे पलटकर न देखें।

9. दीपावली के दिन अशोक के पेड़ के पत्तों से वंदनद्वार बनाएं और इसे मुख्य दरवाजे पर लगाएं। ऐसा करने से घर की नकारात्मक ऊर्जा नष्ट हो जाएगी।

10. किसी शिव मंदिर जाएं और वहां शिवलिंग पर अक्षत यानी चावल चढ़ाएं। ध्यान रहें सभी चावल पूर्ण होने चाहिए। खंडित चावल शिवलिंग पर चढ़ाना नहीं चाहिए।

11. अपने घर के आसपास किसी पीपल के पेड़ के नीचे तेल का दीपक जलाएं। यह उपाय दीपावली की रात में किया जाना चाहिए। ध्यान रखें दीपक लगाकर चुपचाप अपने घर लौट आए, पीछे पलटकर न देखें।

12. यदि संभव हो सके तो दीपावली की देर रात तक घर का मुख्य दरवाजा खुला रखें। ऐसा माना जाता है कि दिवाली की रात में महालक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं और अपने भक्तों के घर जाती हैं।

13. महालक्ष्मी के पूजन में पीली कौड़ियां भी रखनी चाहिए। ये कौडिय़ा पूजन में रखने से महालक्ष्मी बहुत ही जल्द प्रसन्न होती हैं। आपकी धन संबंधी सभी परेशानियां खत्म हो जाएंगी।

14. दीपावली की रात लक्ष्मी पूजा करते समय एक थोड़ा बड़ा घी का दीपक जलाएं, जिसमें नौ बत्तियां लगाई जा सके। सभी 9 बत्तियां जलाएं और लक्ष्मी पूजा करें।

15. दीपावली की रात में लक्ष्मी पूजन के साथ ही अपनी दुकान, कम्प्यूटर आदि ऐसी चीजों की भी पूजा करें, जो आपकी कमाई का साधन हैं।

16. लक्ष्मी पूजन के समय एक नारियल लें और उस पर अक्षत, कुमकुम, पुष्प आदि अर्पित करें और उसे भी पूजा में रखें।

17. दीपावली के दिन झाड़ू अवश्य खरीदना चाहिए। पूरे घर की सफाई नई झाड़ू से करें। जब झाड़ू का काम न हो तो उसे छिपाकर रखना चाहिए।

18. इस दिन अमावस्या रहती है और इस तिथि पर पीपल के वृक्ष को जल अर्पित करना चाहिए। ऐसा करने पर शनि के दोष और कालसर्प दोष समाप्त हो जाते हैं।

19. प्रथम पूज्य श्रीगणेश को दूर्वा अर्पित करें। दूर्वा की 21 गांठ गणेशजी को चढ़ाने से उनकी कृपा प्राप्त होती है। दीपावली के शुभ दिन यह उपाय करने से गणेशजी के साथ महालक्ष्मी की कृपा भी प्राप्त होती है।

20. दीपावली से प्रतिदिन सुबह घर से निकलने से पहले केसर का तिलक लगाएं। ऐसा हर रोज करें, महालक्ष्मी की कृपा प्राप्त होगी।

21. यदि संभव हो सके तो दीपावली पर किसी गरीब व्यक्ति को काले कंबल का दान करें। ऐसा करने पर शनि और राहु-केतु के दोष शांत होंगे और कार्यों में आ रही रुकावटें दूर हो जाएंगी।

22. महालक्ष्मी के पूजन में दक्षिणावर्ती शंख भी रखना चाहिए। यह शंख महालक्ष्मी को अतिप्रिय है। इसकी पूजा करने पर घर में सुख-शांति का वास होता है।

23. महालक्ष्मी के चित्र का पूजन करें, जिसमें लक्ष्मी अपने स्वामी भगवान विष्णु के पैरों के पास बैठी है। ऐसे चित्र का पूजन करने पर देवी बहुत जल्द प्रसन्न होती हैं।

24. दीपावली के पांचों दिनों में घर में शांति बनाए रखें। किसी भी प्रकार का क्लेश, वाद-विवाद न करें। जिस घर में शांति रहती है वहां देवी लक्ष्मी हमेशा निवास करती हैं।

25. दीपावली पर ब्रह्म मुहूर्त में उठें और स्नान करते समय नहाने के पानी में कच्चा दूध और गंगाजल मिलाएं। स्नान के बाद अच्छे वस्त्र धारण करें और सूर्य को जल अर्पित करें।

 जल अर्पित करने के साथ ही लाल पुष्प भी सूर्य को चढ़ाएं। किसी ब्राह्मण या जरूरतमंद व्यक्ति को अनाज का दान करें। अनाज के साथ ही वस्त्र का दान करना भी श्रेष्ठ रहता है।

26. दीपावाली पर श्रीसूक्त एवं कनकधारा स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। रामरक्षा स्तोत्र या हनुमान चालीसा या सुंदरकांड का पाठ भी किया जा सकता है।

27. महालक्ष्मी को तुलसी के पत्ते भी चढ़ाने चाहिए। लक्ष्मी पूजा में दीपक दाएं, अगरबत्ती बाएं, पुष्य सामने व नैवेद्य थाली में दक्षिण में रखना श्रेष्ठ रहता है।

28. महालक्ष्मी के मंत्र: ऊँ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद् श्रीं ह्रीं श्रीं ऊँ महालक्ष्मयै नम:, इस मंत्र का जप करें। मंत्र जप के लिए कमल के गट्टे की माला का उपयोग करें। दीपावली पर कम से कम 108 बार इस मंत्र का जप करें।

29. दीपावली से यह एक नियम रोज के लिए बना लें कि सुबह जब भी उठे तो उठते ही सबसे पहले अपनी दोनों हथेलियों का दर्शन करना चाहिए।

30. दीपावली पर श्रीयंत्र के सामने अगरबत्ती व दीपक लगाकर पूर्व दिशा की ओर मुख करके कुश के आसन पर बैठें।

 फिर श्रीयंत्र का पूजन करें और कमलगट्टे की माला से महालक्ष्मी के मंत्र: ऊँ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद् श्रीं ह्रीं श्रीं ऊँ महालक्ष्मयै नम: का जप करें।

31. किसी में मंदिर झाड़ू का दान करें। यदि आपके घर के आसपास कहीं महालक्ष्मी का मंदिर हो तो वहां गुलाब की सुगंध वाली अगरबत्ती का दान करें।

32. घर के मुख्य द्वार पर कुमकुम से स्वस्तिक का चिह्न बनाएं। द्वार के दोनों ओर कुमकुम से ही शुभ-लाभ लिखें।

33. लक्ष्मी पूजन में सुपारी रखें। सुपारी पर लाल धागा लपेटकर अक्षत, कुमकुम, पुष्प आदि पूजन सामग्री से पूजा करें और पूजन के बाद इस सुपारी को तिजोरी में रखें।

34. दीपावली के दिन श्वेतार्क गणेश की प्रतिमा घर में लाएंगे तो हमेशा बरकत बनी रहेगी। परिवार के सदस्यों को पैसों की कमी नहीं आएगी।

35. यदि संभव हो सके तो इस दिन किसी तालाब या नदी में मछलियों को आटे की गोलियां बनाकर खिलाएं। शास्त्रों के अनुसार इस पुण्य कर्म से बड़े-बड़े संकट भी दूर हो जाते हैं।

36. घर में स्थित तुलसी के पौधे के पास दीपावली की रात में दीपक जलाएं। तुलसी को वस्त्र अर्पित करें।

37. स्फटिक से बना श्रीयंत्र दीपावली के दिन बाजार से खरीदकर लाएं। श्रीयंत्र को लाल वस्त्र में लपेटकर तिजोरी में रखें। कभी भी पैसों की कमी नहीं होगी।

38. दीपावली पर सुबह-सुबह शिवलिंग पर तांबे के लोटे से जल अर्पित करें। जल में यदि केसर भी डालेंगे तो श्रेष्ठ रहेगा।

39. जो लोग धन का संचय बढ़ाना चाहते हैं, उन्हें तिजोरी में लाल कपड़ा बिछाना चाहिए। इसके प्रभाव से धन का संचय बढ़ता है। महालक्ष्मी का ऐसा फोटो रखें, जिसमें लक्ष्मी बैठी हुईं दिखाई दे रही हैं।

40. उपाय के अनुसार दीपावली के दिन 3 अभिमंत्रित गोमती चक्र, 3 पीली कौडिय़ां और 3 हल्दी गांठों को एक पीले कपड़ें में बांधें। इसके बाद इस पोटली को तिजोरी में रखें। धन लाभ के योग बनने लगेंगे।

41. यदि धन संबंधियों परेशानियों का सामना कर रहे हैं तो किसी भी श्रेष्ठ मुहूर्त में हनुमानजी का यह उपाय करें।

42. उपाय के अनुसार किसी पीपल के वृक्ष एक पत्ता तोड़ें। उस पत्ते पर कुमकुम या चंदन से श्रीराम का लिखें। इसके बाद पत्ते पर मिठाई रखें और यह हनुमानजी को अर्पित करें। इस उपाय से भी धन लाभ होता है।

43. एक बात का विशेष ध्यान रखें कि माह की हर अमावस्या पर पूरे घर की अच्छी तरह से साफ-सफाई की जानी चाहिए। साफ-सफाई के बाद घर में धूप-दीप-ध्यान करें। इससे घर का वातावरण पवित्र और बरकत देने वाला बना रहेगा।

44. सप्ताह में एक बार किसी जरूरतमंद सुहागिन स्त्री को सुहाग का सामना दान करें। इस उपाय से देवी लक्ष्मी तुरंत ही प्रसन्न होती हैं और धन संबंधी परेशानियों को दूर करती हैं। ध्यान रखें यह उपाय नियमित रूप से हर सप्ताह करना चाहिए।

45. यदि कोई व्यक्ति दीपावली के दिन किसी पीपल के वृक्ष के नीचे छोटा सा शिवलिंग स्थापित करता है तो उसकी जीवन में कभी भी कोई परेशानियां नहीं आएंगी।
यदि कोई भयंकर परेशानियां चल रही होंगी वे भी दूर हो जाएंगी।

 पीपल के नीचे शिवलिंग स्थापित करके उसकी नियमित पूजा भी करनी चाहिए। इस उपाय से गरीब व्यक्ति भी धीरे-धीरे मालामाल हो जाता है।

46. पीपल के 11 पत्ते तोड़ें और उन पर श्रीराम का नाम लिखें। राम नाम लिखने के लिए चंदन का उपयोग किया जा

सकता है। यह काम पीपल के नीचे बैठकर करेंगे तो जल्दी शुभ परिणाम प्राप्त होते हैं। राम नाम लिखने के बाद इन पत्तों की माला बनाएं और हनुमानजी को अर्पित करें।

47. कलयुग में हनुमानजी शीघ्र प्रसन्न होने वाले देवता माने गए हैं। इनकी कृपा प्राप्त करने के लिए कई प्रकार उपाय बताए गए हैं। यदि पीपल के वृक्ष के नीचे बैठकर हनुमान चालीसा का पाठ किया जाए तो यह चमत्कारी फल प्रदान करने वाला उपाय है।

48. शनि दोषों से मुक्ति के लिए तो पीपल के वृक्ष के उपाय रामबाण हैं। शनि की साढ़ेसाती और ढय्या के बुरे प्रभावों को नष्ट करने के लिए पीपल के वृक्ष पर जल चढ़ाकर सात परिक्रमा करनी चाहिए। इसके साथ ही शाम के समय पीपल के वृक्ष के नीचे दीपक भी लगाना चाहिए।

49. दीपावली से एक नियम हर रोज के लिए बना लें। आपके घर में जब भी खाना बने तो उसमें से सबसे पहली रोटी गाय को खिलाएं।

50. शास्त्रों के अनुसार एक पीपल का पौधा लगाने वाले व्यक्ति को जीवन में किसी भी प्रकार को कोई दुख नहीं सताता है। उस इंसान को कभी भी पैसों की कमी नहीं रहती है।

 पीपल का पौधा लगाने के बाद उसे नियमित रूप से जल अर्पित करना चाहिए। जैसे-जैसे यह वृक्ष बड़ा होगा आपके घर-परिवार में सुख-समृद्धि बढ़ती जाएगी,

धन बढ़ता जाएगा। पीपल के बड़े होने तक इसका पूरा ध्यान रखना चाहिए तभी आश्चर्यजनक लाभ प्राप्त होंगे।

51. दीपावली पर लक्ष्मी का पूजन करने के लिए स्थिर लग्न श्रेष्ठ माना जाता है। इस लग्न में पूजा करने पर महालक्ष्मी स्थाई रूप से घर में निवास करती हैं।

-पूजा में लक्ष्मी यंत्र, कुबेर यंत्र और श्रीयंत्र रखना चाहिए। यदि स्फटिक का श्रीयंत्र हो तो सर्वश्रेष्ठ रहता है। एकाक्षी नारियल, दक्षिणावर्त शंख, हत्थाजोड़ी की भी पूजा करनी चाहिए।
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Wednesday, October 16, 2019

करवा चौथ : 17अक्टूबर 2019 विशेष


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करवा चौथ व्रत का हिन्दू संस्कृति में विशेष महत्त्व है। इस दिन पति की लम्बी उम्र के पत्नियां पूर्ण श्रद्धा से निर्जला व्रत रखती है।

सुहागन महिलाओं के लिए चौथ महत्वपूर्ण है। इसलिए इस दिन पति की लंबी उम्र के साथ संतान सुख की मनोकामना भी पूर्ण हो सकती है।

करवा चौथ महात्म्य
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छांदोग्य उपनिषद् के अनुसार चंद्रमा में पुरुष रूपी ब्रह्मा की उपासना करने से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। इससे जीवन में किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं होता है। साथ ही साथ इससे लंबी और पूर्ण आयु की प्राप्ति होती है। करवा चौथ के व्रत में शिव, पार्वती, कार्तिकेय, गणेश तथा चंद्रमा का पूजन करना चाहिए। चंद्रोदय के बाद चंद्रमा को अघ्र्य देकर पूजा होती है। पूजा के बाद मिट्टी के करवे में चावल,उड़द की दाल, सुहाग की सामग्री रखकर सास अथवा सास के समकक्ष किसी सुहागिन के पांव छूकर सुहाग सामग्री भेंट करनी चाहिए।

महाभारत से संबंधित पौराणिक कथा के अनुसार पांडव पुत्र अर्जुन तपस्या करने नीलगिरी पर्वत पर चले जाते हैं। दूसरी ओर बाकी पांडवों पर कई प्रकार के संकट आन पड़ते हैं। द्रौपदी भगवान श्रीकृष्ण से उपाय पूछती हैं। वह कहते हैं कि यदि वह कार्तिक कृष्ण चतुर्थी के दिन करवाचौथ का व्रत करें तो इन सभी संकटों से मुक्ति मिल सकती है। द्रौपदी विधि विधान सहित करवाचौथ का व्रत रखती है जिससे उनके समस्त कष्ट दूर हो जाते हैं। इस प्रकार की कथाओं से करवा चौथ का महत्त्व हम सबके सामने आ जाता है।

महत्त्व के बाद बात आती है कि करवा चौथ की पूजा विधि क्या है? किसी भी व्रत में पूजन विधि का बहुत महत्त्व होता है। अगर सही विधि पूर्वक पूजा नहीं की जाती है तो इससे पूरा फल प्राप्त नहीं हो पाता है।

चौथ की पूजन सामग्री और व्रत की विधि 
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करवा चौथ पर्व की पूजन सामग्री👇

कुंकुम, शहद, अगरबत्ती, पुष्प, कच्चा दूध, शक्कर, शुद्ध घी, दही, मेंहदी, मिठाई, गंगाजल, चंदन, चावल, सिन्दूर, मेंहदी, महावर, कंघा, बिंदी, चुनरी, चूड़ी, बिछुआ, मिट्टी का टोंटीदार करवा व ढक्कन, दीपक, रुई, कपूर, गेहूँ, शक्कर का बूरा, हल्दी, पानी का लोटा, गौरी बनाने के लिए पीली मिट्टी, लकड़ी का आसन, छलनी, आठ पूरियों की अठावरी, हलुआ, दक्षिणा के लिए पैसे।

सम्पूर्ण सामग्री को एक दिन पहले ही एकत्रित कर लें।

व्रत वाले दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठ कर स्नान कर स्वच्छ कपड़े पहन लें तथा शृंगार भी कर लें। इस अवसर पर करवा की पूजा-आराधना कर उसके साथ शिव-पार्वती की पूजा का  विधान है क्योंकि माता पार्वती ने कठिन तपस्या करके शिवजी को प्राप्त कर अखंड सौभाग्य प्राप्त किया था इसलिए शिव-पार्वती की पूजा की जाती है। करवा चौथ के दिन चंद्रमा की पूजा का धार्मिक और ज्योतिष दोनों ही दृष्टि से महत्व है। व्रत के दिन प्रात: स्नानादि करने के पश्चात यह संकल्प बोल कर करवा चौथ व्रत का आरंभ करें।

करवा चौथ पूजन विधि
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प्रात: काल में नित्यकर्म से निवृ्त होकर संकल्प लें और व्रत आरंभ करें।

व्रत के दिन निर्जला रहे यानि जलपान ना करें।

व्रत के दिन प्रातः स्नानादि करने के पश्चात यह संकल्प बोलकर करवा चौथ व्रत का आरंभ करें-
प्रातः पूजा के समय इस मन्त्र के जप से व्रत प्रारंभ किया जाता है- 'मम सुखसौभाग्य पुत्रपौत्रादि सुस्थिर श्री प्राप्तये करक चतुर्थी व्रतमहं करिष्ये।'

अथवा👇

ॐ शिवायै नमः' से पार्वती का,
'ॐ नमः शिवाय' से शिव का,
'ॐ षण्मुखाय नमः' से स्वामी कार्तिकेय का, 'ॐ गणेशाय नमः' से गणेश का तथा
'ॐ सोमाय नमः' से चंद्रमा का पूजन करें।

शाम के समय, माँ पार्वती की प्रतिमा की गोद में श्रीगणेश को विराजमान कर उन्हें बालू अथवा सफेद मिट्टी की वेदी अथवा लकड़ी के आसार पर शिव-पार्वती, स्वामी कार्तिकेय, गणेश एवं चंद्रमा की स्थापना करें। मूर्ति के अभाव में सुपारी पर नाड़ा बाँधकर देवता की भावना करके स्थापित करें। पश्चात माँ पार्वती का सुहाग सामग्री आदि से श्रृंगार करें।

भगवान शिव और माँ पार्वती की आराधना करें और कोरे करवे में पानी भरकर पूजा करें। एक लोटा, एक वस्त्र व एक विशेष करवा दक्षिणा के रूप में अर्पित करें।

सौभाग्यवती स्त्रियां पूरे दिन का व्रत कर व्रत की कथा का श्रवण करें। चंद्रोदय के बाद चाँद को अर्घ्य देकर अपने पति के हाथ से जल एवं मिष्ठान खा कर व्रत खोले।

करवा चौथ प्रथम कथा
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बहुत समय पहले की बात है, एक साहूकार के सात बेटे और उनकी एक बहन करवा थी। सभी सातों भाई अपनी बहन से बहुत प्यार करते थे। यहाँ तक कि वे पहले उसे खाना खिलाते और बाद में स्वयं खाते थे। एक बार उनकी बहन ससुराल से मायके आई हुई लव थी।

शाम को भाई जब अपना व्यापार-व्यवसाय बंद कर घर आए तो देखा उनकी बहन बहुत व्याकुल थी। सभी भाई खाना

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Tuesday, September 3, 2019

श्री राम रक्षा स्तोत्र

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मित्रो आज हम आपको श्री राम रक्षा स्तोत्र भावार्थ सहित बतायेगें!!!!!!

इस राम रक्षा स्तोत्र मंत्र के रचयिता बुध कौशिक ऋषि हैं, सीता और रामचंद्र देवता हैं, अनुष्टुप छंद हैं, सीता शक्ति हैं, हनुमान जी कीलक है तथा श्री रामचंद्र जी की प्रसन्नता के लिए राम रक्षा स्तोत्र के जप में विनियोग किया जाता हैं।

॥ अथ ध्यानम्‌ ॥

ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्दद्पद्‌मासनस्थं ।
पीतं वासोवसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम्‌ ॥
वामाङ्‌कारूढसीता मुखकमलमिलल्लोचनं नीरदाभं ।
नानालङ्‌कारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डनं रामचंद्रम्‌ ॥

ध्यान धरिए — जो धनुष-बाण धारण किए हुए हैं,बद्द पद्मासन की मुद्रा में विराजमान हैं और पीतांबर पहने हुए हैं, जिनके आलोकित नेत्र नए कमल दल के समान स्पर्धा करते हैं, जो बाएँ ओर स्थित सीताजी के मुख कमल से मिले हुए हैं- उन आजानु बाहु, मेघश्याम,विभिन्न अलंकारों से विभूषित तथा जटाधारी श्रीराम का ध्यान करें |

॥ इति ध्यानम्‌ ॥

चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम्‌ ।
एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम्‌ ॥१॥

श्री रघुनाथजी का चरित्र सौ करोड़ विस्तार वाला हैं | उसका एक-एक अक्षर महापातकों को नष्ट करने वाला है |

ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम्‌ ।
जानकीलक्ष्मणॊपेतं जटामुकुटमण्डितम्‌ ॥२॥

नीले कमल के श्याम वर्ण वाले, कमलनेत्र वाले , जटाओं के मुकुट से सुशोभित, जानकी तथा लक्ष्मण सहित ऐसे भगवान् श्री राम का स्मरण करके,

सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तं चरान्तकम्‌ ।
स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम्‌ ॥३॥

जो अजन्मा एवं सर्वव्यापक, हाथों में खड्ग, तुणीर, धनुष-बाण धारण किए राक्षसों के संहार तथा अपनी लीलाओं से जगत रक्षा हेतु अवतीर्ण श्रीराम का स्मरण करके,

रामरक्षां पठॆत्प्राज्ञ: पापघ्नीं सर्वकामदाम्‌ ।
शिरो मे राघव: पातु भालं दशरथात्मज: ॥४॥

मैं सर्वकामप्रद और पापों को नष्ट करने वाले राम रक्षा स्तोत्र का पाठ करता हूँ | राघव मेरे सिर की और दशरथ के पुत्र मेरे ललाट की रक्षा करें |

कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रिय: श्रुती ।
घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सल: ॥५॥

कौशल्या नंदन मेरे नेत्रों की, विश्वामित्र के प्रिय मेरे कानों की, यज्ञरक्षक मेरे घ्राण की और सुमित्रा के वत्सल मेरे मुख की रक्षा करें |

जिव्हां विद्दानिधि: पातु कण्ठं भरतवंदित: ।
स्कन्धौ दिव्यायुध: पातु भुजौ भग्नेशकार्मुक: ॥६॥

मेरी जिह्वा की विधानिधि रक्षा करें, कंठ की भरत-वंदित, कंधों की दिव्यायुध और भुजाओं की महादेवजी का धनुष तोड़ने वाले भगवान् श्रीराम रक्षा करें |

करौ सीतपति: पातु हृदयं जामदग्न्यजित्‌ ।
मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रय: ॥७॥

मेरे हाथों की सीता पति श्रीराम रक्षा करें, हृदय की जमदग्नि ऋषि के पुत्र (परशुराम) को जीतने वाले, मध्य भाग की खर (नाम के राक्षस) के वधकर्ता और नाभि की जांबवान के आश्रयदाता रक्षा करें |

सुग्रीवेश: कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभु: ।
ऊरू रघुत्तम: पातु रक्ष:कुलविनाशकृत्‌ ॥८॥

मेरे कमर की सुग्रीव के स्वामी, हडियों की हनुमान के प्रभु और रानों की राक्षस कुल का विनाश करने वाले रघुश्रेष्ठ रक्षा करें |

जानुनी सेतुकृत्पातु जङ्‌घे दशमुखान्तक: ।
पादौ बिभीषणश्रीद: पातु रामोSखिलं वपु: ॥९॥

मेरे जानुओं की सेतुकृत, जंघाओं की दशानन वधकर्ता, चरणों की विभीषण को ऐश्वर्य प्रदान करने वाले और सम्पूर्ण शरीर की श्रीराम रक्षा करें |

एतां रामबलोपेतां रक्षां य: सुकृती पठॆत्‌ ।
स चिरायु: सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत्‌ ॥१०॥

शुभ कार्य करने वाला जो भक्त भक्ति एवं श्रद्धा के साथ रामबल से संयुक्त होकर इस स्तोत्र का पाठ करता हैं, वह दीर्घायु, सुखी, पुत्रवान, विजयी और विनयशील हो जाता हैं |

पातालभूतलव्योम चारिणश्छद्‌मचारिण: ।
न द्र्ष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभि: ॥११॥

जो जीव पाताल, पृथ्वी और आकाश में विचरते रहते हैं अथवा छद्दम वेश में घूमते रहते हैं , वे राम नामों से सुरक्षित मनुष्य को देख भी नहीं पाते |

रामेति रामभद्रेति रामचंद्रेति वा स्मरन्‌ ।
नरो न लिप्यते पापै भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ॥१२॥

राम, रामभद्र तथा रामचंद्र आदि नामों का स्मरण करने वाला रामभक्त पापों से लिप्त नहीं होता. इतना ही नहीं, वह अवश्य ही भोग और मोक्ष दोनों को प्राप्त करता है |

जगज्जेत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम्‌ ।
य: कण्ठे धारयेत्तस्य करस्था: सर्वसिद्द्दय: ॥१३॥

जो संसार पर विजय करने वाले मंत्र राम-नाम से सुरक्षित इस स्तोत्र को कंठस्थ कर लेता हैं, उसे सम्पूर्ण सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं |

वज्रपंजरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत्‌ ।
अव्याहताज्ञ: सर्वत्र लभते जयमंगलम्‌ ॥१४॥

जो मनुष्य वज्रपंजर नामक इस राम कवच का स्मरण करता हैं, उसकी आज्ञा का कहीं भी उल्लंघन नहीं होता तथा उसे सदैव विजय और मंगल की ही प्राप्ति होती हैं |

आदिष्टवान्यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हर: ।
तथा लिखितवान्‌ प्रात: प्रबुद्धो बुधकौशिक: ॥१५॥

भगवान् शंकर ने स्वप्न में इस रामरक्षा स्तोत्र का आदेश बुध कौशिक ऋषि को दिया था, उन्होंने प्रातः काल जागने पर उसे वैसा ही लिख दिया |

आराम: कल्पवृक्षाणां विराम: सकलापदाम्‌ ।
अभिरामस्त्रिलोकानां राम: श्रीमान्‌ स न: प्रभु: ॥१६॥

जो कल्प वृक्षों के बगीचे के समान विश्राम देने वाले हैं, जो समस्त विपत्तियों को दूर करने वाले हैं (विराम माने थमा देना, किसको थमा देना/दूर कर देना ? सकलापदाम = सकल आपदा = सारी विपत्तियों को)  और जो तीनो लोकों में सुंदर (अभिराम + स्+ त्रिलोकानाम) हैं, वही श्रीमान राम हमारे प्रभु हैं |

तरुणौ रूपसंपन्नौ सुकुमारौ महाबलौ ।
पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ ॥१७॥

जो युवा,सुन्दर, सुकुमार,महाबली और कमल (पुण्डरीक) के समान विशाल नेत्रों वाले हैं, मुनियों की तरह वस्त्र एवं काले मृग का चर्म धारण करते हैं |

फलमूलशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ ।
पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥१८॥

जो फल और कंद का आहार ग्रहण करते हैं, जो संयमी , तपस्वी एवं ब्रह्रमचारी हैं , वे दशरथ के पुत्र राम और लक्ष्मण दोनों भाई हमारी रक्षा करें |

शरण्यौ सर्वसत्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम्‌ ।
रक्ष:कुलनिहन्तारौ त्रायेतां नो रघुत्तमौ ॥१९॥

ऐसे महाबली – रघुश्रेष्ठ मर्यादा पुरूषोतम समस्त प्राणियों के शरणदाता, सभी धनुर्धारियों में श्रेष्ठ और राक्षसों के कुलों का समूल नाश करने में समर्थ हमारा त्राण करें |

आत्तसज्जधनुषा विषुस्पृशा वक्षया शुगनिषङ्‌ग सङि‌गनौ ।
रक्षणाय मम रामलक्ष्मणा वग्रत: पथि सदैव गच्छताम्‌ ॥२०॥

संघान किए धनुष धारण किए, बाण का स्पर्श कर रहे, अक्षय बाणों से युक्त तुणीर लिए हुए राम और लक्ष्मण मेरी रक्षा करने के लिए मेरे आगे चलें |

संनद्ध: कवची खड्‌गी चापबाणधरो युवा ।
गच्छन्‌मनोरथोSस्माकं राम: पातु सलक्ष्मण: ॥२१॥

हमेशा तत्पर, कवचधारी, हाथ में खडग, धनुष-बाण तथा युवावस्था वाले भगवान् राम लक्ष्मण सहित आगे-आगे चलकर हमारी रक्षा करें |

रामो दाशरथि: शूरो लक्ष्मणानुचरो बली ।
काकुत्स्थ: पुरुष: पूर्ण: कौसल्येयो रघुत्तम: ॥२२॥

भगवान् का कथन है की श्रीराम, दाशरथी, शूर, लक्ष्मनाचुर, बली, काकुत्स्थ , पुरुष, पूर्ण, कौसल्येय, रघुतम, 

वेदान्तवेद्यो यज्ञेश: पुराणपुरुषोत्तम: ।
जानकीवल्लभ: श्रीमानप्रमेय पराक्रम: ॥२३॥

वेदान्त्वेघ, यज्ञेश,पुराण पुरूषोतम , जानकी वल्लभ, श्रीमान और अप्रमेय पराक्रम आदि नामों का

इत्येतानि जपेन्नित्यं मद्‌भक्त: श्रद्धयान्वित: ।
अश्वमेधाधिकं पुण्यं संप्राप्नोति न संशय: ॥२४॥

नित्यप्रति श्रद्धापूर्वक जप करने वाले को निश्चित रूप से अश्वमेध यज्ञ से भी अधिक फल प्राप्त होता हैं |

रामं दूर्वादलश्यामं पद्‌माक्षं पीतवाससम्‌ ।
स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्न ते संसारिणो नर: ॥२५॥

दूर्वादल के समान श्याम वर्ण, कमल-नयन एवं पीतांबरधारी श्रीराम की उपरोक्त दिव्य नामों से स्तुति करने वाला संसारचक्र में नहीं पड़ता |

रामं लक्शमण पूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुंदरम्‌ ।
काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम्‌
राजेन्द्रं सत्यसंधं दशरथनयं श्यामलं शान्तमूर्तिम्‌ ।
वन्दे लोकभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम्‌ ॥२६॥

लक्ष्मण जी के पूर्वज , सीताजी के पति, काकुत्स्थ, कुल-नंदन, करुणा के सागर , गुण-निधान , विप्र भक्त, परम धार्मिक , राजराजेश्वर, सत्यनिष्ठ, दशरथ के पुत्र, श्याम और शांत मूर्ति, सम्पूर्ण लोकों में सुन्दर, रघुकुल तिलक , राघव एवं रावण के शत्रु भगवान् राम की मैं वंदना करता हूँ |

रामाय रामभद्राय रामचंद्राय वेधसे ।
रघुनाथाय नाथाय सीताया: पतये नम: ॥२७॥

राम, रामभद्र, रामचंद्र, विधात स्वरूप , रघुनाथ, प्रभु एवं सीताजी के स्वामी की मैं वंदना करता हूँ |

श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम ।
श्रीराम राम भरताग्रज राम राम ।
श्रीराम राम रणकर्कश राम राम ।
श्रीराम राम शरणं भव राम राम ॥२८॥

हे रघुनन्दन श्रीराम ! हे भरत के अग्रज भगवान् राम! हे रणधीर, मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ! आप मुझे शरण दीजिए |

श्रीरामचन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि ।
श्रीरामचन्द्रचरणौ वचसा गृणामि ।
श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामि ।
श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये ॥२९॥

मैं एकाग्र मन से श्रीरामचंद्रजी के चरणों का स्मरण और वाणी से गुणगान करता हूँ, वाणी द्धारा और पूरी श्रद्धा के साथ भगवान् रामचन्द्र के चरणों को प्रणाम करता हुआ मैं उनके चरणों की शरण लेता हूँ |

माता रामो मत्पिता रामचंन्द्र: ।
स्वामी रामो मत्सखा रामचंद्र: ।
सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालु ।
नान्यं जाने नैव जाने न जाने ॥३०॥

श्रीराम मेरे माता, मेरे पिता , मेरे स्वामी और मेरे सखा हैं | इस प्रकार दयालु श्रीराम मेरे सर्वस्व हैं. उनके सिवा में किसी दुसरे को नहीं जानता |

दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे तु जनकात्मजा ।
पुरतो मारुतिर्यस्य तं वन्दे रघुनंदनम्‌ ॥३१॥

जिनके दाईं और लक्ष्मण जी, बाईं और जानकी जी और सामने हनुमान ही विराजमान हैं, मैं उन्ही रघुनाथ जी की वंदना करता हूँ |

लोकाभिरामं रनरङ्‌गधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम्‌ ।
कारुण्यरूपं करुणाकरंतं श्रीरामचंद्रं शरणं प्रपद्ये ॥३२॥

मैं सम्पूर्ण लोकों में सुन्दर तथा रणक्रीड़ा में धीर, कमलनेत्र, रघुवंश नायक, करुणा की मूर्ति और करुणा के भण्डार की श्रीराम की शरण में हूँ |

मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्‌ ।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये ॥३३॥

जिनकी गति मन के समान और वेग वायु के समान (अत्यंत तेज) है, जो परम जितेन्द्रिय एवं बुद्धिमानों में श्रेष्ठ हैं, मैं उन पवन-नंदन वानारग्रगण्य श्रीराम दूत की शरण लेता हूँ |

कूजन्तं रामरामेति मधुरं मधुराक्षरम्‌ ।
आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम्‌ ॥३४॥

मैं कवितामयी डाली पर बैठकर, मधुर अक्षरों वाले ‘राम-राम’ के मधुर नाम को कूजते हुए वाल्मीकि रुपी कोयल की वंदना करता हूँ |

आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसंपदाम्‌ ।
लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम्‌ ॥३५॥

मैं इस संसार के प्रिय एवं सुन्दर उन भगवान् राम को बार-बार नमन करता हूँ, जो सभी आपदाओं को दूर करने वाले तथा सुख-सम्पति प्रदान करने वाले हैं |

भर्जनं भवबीजानामर्जनं सुखसंपदाम्‌ ।
तर्जनं यमदूतानां रामरामेति गर्जनम्‌ ॥३६॥

‘राम-राम’ का जप करने से मनुष्य के सभी कष्ट समाप्त हो जाते हैं | वह समस्त सुख-सम्पति तथा ऐश्वर्य प्राप्त कर लेता हैं | राम-राम की गर्जना से यमदूत सदा भयभीत रहते हैं |

रामो राजमणि: सदा विजयते रामं रमेशं भजे ।
रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नम: ।
रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोSस्म्यहम्‌ ।
रामे चित्तलय: सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर ॥३७॥

राजाओं में श्रेष्ठ श्रीराम सदा विजय को प्राप्त करते हैं | मैं लक्ष्मीपति भगवान् श्रीराम का भजन करता हूँ | सम्पूर्ण राक्षस सेना का नाश करने वाले श्रीराम को मैं नमस्कार करता हूँ | श्रीराम के समान अन्य कोई आश्रयदाता नहीं | मैं उन शरणागत वत्सल का दास हूँ | मैं हमेशा श्रीराम मैं ही लीन रहूँ | हे श्रीराम! आप मेरा (इस संसार सागर से) उद्धार करें |

राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे ।
सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥३८॥

  (शिव पार्वती से बोले –) हे सुमुखी ! राम- नाम ‘विष्णु सहस्त्रनाम’ के समान हैं | मैं सदा राम का स्तवन करता हूँ और राम-नाम में ही रमण करता हूँ |

इति श्रीबुधकौशिकविरचितं श्रीरामरक्षास्तोत्रं संपूर्णम्‌ ॥

॥ श्री सीतारामचंद्रार्पणमस्तु ॥

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Friday, August 30, 2019

जानें गणेश चतुर्थी तिथि


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जानें गणेश चतुर्थी तिथि, डेट, टाइम, कथा और महत्व
भगवान गणेश को ज्ञान, बुद्धि और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। भगवान गणेश को गजानन, गजदंत, गजमुख जैसे नामों से भी जाना जाता है। हर साल गणेश चतुर्थी का पर्व भगवान गणेश के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। गणेश चतुर्थी का पर्व हर साल हिन्दू पंचाग के भाद्रपद मास शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को  मनाया जाता है। इस बार गणेश चतुथी 2 सितंबर को शुरू हो रही है। दो सितंबर को ही लोग भगवान गणेश की मूर्ति स्थापति कर अगले 10 दिन तक गणेश उत्सव मनाएंगे।

गणेश चतुर्थी कथा - पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार माता पार्वती स्नान करने से पहले चंदन का उपटन लगा रही थीं। इस उबटन से उन्होंने भगवान गणेश को तैयार किया और घर के दरवाजे के बाहर सुरक्षा के लिए बैठा दिया। इसके बाद मां पार्वती स्नान करने लगे। तभी भगवान शिव घर पहुंचे तो भगवान गणेश ने उन्हें घर में जाने से रोक दिया। इससे भगवान शिव क्रोधित हो गए और गणेश सिर धड़ से अलग कर दिया। मां पार्वती को जब इस बात का पता चला तो वह बहुत दुखी हुईं। इसके बाद भगवान शिव ने उन्हें वचन दिया कि वह गणेश को जीवित कर देंगे। भगवान शिव ने अपने गणों से कहा कि गणेश का सिर ढूंढ़ कर लाएं। गणों को किसी भी बालक का सिर नहीं मिला तो वे एक हाथी के बच्चे का सिर लेकर आए और गणेश भगवान को लगा दिया। इस प्रकार माना गया कि हाथी के सिर के साथ भगवान गणेश का दोबारा जन्म हुआ। मान्यताओं के अनुसार यह घटना चतुर्थी के दिन ही हुई थी। इसलिए इस दिन को गणेश चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है।

गणेशोत्सव से जुड़ी मान्यताएं-इस दिन लोग मिट्टी से बनी भगवान गणेश की मूर्तियां अपने घरों में स्थापित करते हैं। गणेश चतुर्थी का उत्सव मूर्ति प्राण प्रतिष्ठा से शुरू होती है। इस पूजा के 16 चरण होते हैं जिसे शोदशोपचार पूजा के नाम से जाना जाता है। इस पूजा के दौरान भगवान गणेश के पसंदीदा लड्डू का भोग लगाया जाता है। इसमें मोदक, श्रीखंड, नारियल चावल, और मोतीचूर के लड्डू शामिल हैं। इन 10 दिनों के पूजा उत्सव में लोग रोज सुबह शाम भगवान गणेश की आरती नियमित रूप से करते हैं। व्यवस्था के अनुसार आयोजक भजन संध्या का भी आयोजन करते हैं।

गणेश चतुर्थी डेट, टाइम और शुभ मुहूर्त-
गणेश चतुर्थी तिथि : 2 सितंबर 2019
गणेश विसर्जन डेट : 12 सितंबर 2019
मध्यान्ह गणेश पूजा : दोपहर 11:05 से 01:36 तक
चंद्रमा न देखने का समय : सुबह 8:55 बजे से शाम 9:05 बजे तक रहेगा।
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Wednesday, August 14, 2019

रक्षा बंधन के त्यौहार को बनाए खास


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रक्षा बंधन के त्यौहार को बनाए खास, जानें कौन से रंग की राखी आपके भाई के लिए रहेगी शुभ ...

भाई बहन के प्रेम का प्रतीक रक्षा बंधन त्यौहर इस बार स्वतंत्रता दिवस यानी कि 15 अगस्त के दिन पड़ रहा है। इस दिन बहनें अपने भाईयों की लंबी उम्र के लिए उन्हें रक्षा सूत्र बांधती है। राखी कौन से कलर की लेनी है,

कैसी राखी लें वैसे तो ये बहनों की चॉइस पर निर्भर करता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि अपने भाई के जीवन में तरक्की के लिए आप उन्हें उनकी राशि अनुसार राखी बांध सकती हैं।

क्योंकि हर एक राशि का एक स्वामी ग्रह होता है। और हर ग्रह का एक पसंदीदा रंग भी होता है। बस उसी को देखते हुए आप अपने भाई के लिए राखी का रंग चुन सकती हैं…

मेष राशि: जिस बहन के भाई की राशि मेष है उन्हें अपनी भाई को लाव रंग की राखी बांधनी चाहिए। क्योंकि इन राशि वालों का स्वामी ग्रह मंगल है। इससे आपके भाई के शरीर में ऊर्जा बनी रहेगी।

वृषभ राशि: वृषभ राशि के जातकों को नीले रंग की राखी बांधना सबसे शुभ रहेगा। क्योंकि आपकी राशि का स्वामी ग्रह शुक्र है।

मिथुन राशि: मिथुन राशि का स्वामी ग्रह बुध है इसलिए अगर आपका भाई इस राशि का है तो आपको उनकी कलाई पर हरे रंग की राखी बांधनी चाहिए।

कर्क राशि: कर्क राशि का स्वामी चंद्रमा हैं इसलिए इस राशि वाले भाई की कलाई पर पीले या सफेद रंग की राखी बांधे।

सिंह राशि: सिंह राशि के स्‍वामी सूर्य देव हैं इसलिए इन भाइयों की कलाई पर सबसे शुभ राखी सुनहरी, पीली या फिर गुलाबी रंग की रहेगी।

कन्या राशि: बुध देवता आपकी राशी के स्वामी हैं इसलिए इन्‍हें सफेद रंग या फिर हरे रंग की राखी बांधनी चाहिए।

तुला राशि: इन राशि के लोगों के स्‍वामी शुक्र हैं। इनकी आपकी कलाई पर सफेद, क्रीम या हल्‍के नीले रंग की राखी बांधना शुभ रहेगा।

वृश्चिक राशि: इन राशि वालों के स्वामी मंगल देव हैं इसलिए अपने भाई की कलाई पर लाल या गुलाबी रंग की राखी बांधें।

धनु राशि: धनु राशि के स्वामी ग्रह बृहस्पति देव हैं इसलिए इन भाइयों की कलाई पर चंदन की राखी सबसे शुभ रहेगी।

मकर राशि: मकर राशि के स्‍वामी ग्रह शनि हैं। और शनि का प्रिय रंग नीला है। इसलिए इन राशिवाले भाई को गहरे नीले रंग की राखी बांधे।

कुंभ राशि: कुंभ राशि के स्‍वामी ग्रह शनि हैं इसलिए अगर आपका भाई इस राशि का है तो उसे गहरे रंग या रुद्राक्ष से निर्मित राखी बांधे।

मीन राशि: मीन राशि के देव बृहस्पति हैं इसलिए इस राशि वाले भाई को सुनहरे पीले रंग की राखी बांधनी चाहिए।

और भी बहुत कुछ है हमारे ज्योतिष शास्त्र में आपके लिए आप भी इस वर्ष रक्षाबंधन में कुछ करना चाहते हैं कुछ पाना चाहते हैं तो संपर्क करें

और खास प्रयोग विधि और टोटका उपाय प्राप्त करके इस रक्षाबंधन को खास बनाएं और जीवन में अनेकों लाभ प्राप्त करें ..
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Monday, July 22, 2019

श्रावण में ग्रह के पूजन कर सकते हैं ?

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श्रावण में जानिए ग्रह के अनुसार किस रोग के लिए क्या उपाय पूजन कर सकते हैं।

सूर्य- से संबंधित कष्ट सिरदर्द, नेत्र रोग, अस्थि रोग आदि हों तो श्रावण मास में शिवलिंग का पूजन आक वृक्ष के पुष्पों, पत्तों एवं बिल्वपत्रों से करने से इन रोगों में आराम मिलता है।

चंद्रमा- से संबंधित बीमारी या कष्ट जैसे खांसी, जुकाम, नजला, मानसिक परेशानी, रक्तचाप की समस्या आदि हों तो शिवलिंग का रुद्री पाठ करते हुए काले तिल मिश्रित दूध धार से रुद्राभिषेक करने से आराम मिलता है।

मंगल- से संबंधित बीमारी जैसे रक्तदोष हो तो गिलोय, जड़ी-बूटी के रस आदि से अभिषेक करने से आराम मिलता है।

बुध- से संबंधित बीमारी जैसे चर्म रोग, गुर्दे का रोग आदि हों तो विदारा या जड़ी-बूटी के रस से अभिषेक करने से आराम मिलता है।

बृहस्पति- से संबंधित बीमारी जैसे चर्बी, आंतों, लिवर की बीमारी आदि हों तो शिवलिंग पर हल्दी मिश्रित दूध चढ़ाने से आराम मिलता है।

शुक्र- से संबंधित बीमारी, वीर्य की कमी, मल-मूत्र की बीमारी, शारीरिक या शक्ति में कमी हो तो पंचामृत, शहद और घृत से शिवलिंग का अभिषेक करने से आराम मिलता है।

शनि- से संबंधित रोग जैसे मांसपेशियों का दर्द, जोड़ों का दर्द, वात रोग आदि हों तो गन्ने के रस और छाछ से शिवलिंग का अभिषेक करने से आराम मिलता है।

राहु -केतु से संबंधित बीमारी जैसे सिर चकराना, मानसिक परेशानी, अधरंग आदि के लिए उपर्युक्त सभी वस्तुओं के अतिरिक्त मृत संजीवनी का सवा लाख बार जप कराकर भांग-धतूरे से शिवलिंग का अभिषेक करने से शांति मिलती है।
🙏🏻 बाबा की विश्वनाथ कृपा सब पर बनी रहे🙏🏻
                              ✍🏻 पं अभिषेक शास्त्री
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Saturday, July 13, 2019

पति-पत्नी का दांपत्य सुख



जनमकुंडली के 12वे घर से पति-पत्नी का सम्भोग सुख देखा जाता l
जनमकुंडली में जब भी 12वे घर में नीच ग्रह यानि राहु जो 12वे घर में नीच का माना जाता वो बैठ जाए या 12वे घर में जो ग्रह अशुभ माने जाते जैसे सूर्य, चंद्र या बुध बैठे हो या 12 वे घर में एक से ज़्यादा ग्रह बैठ जाए जो आपस में दुश्मन माने गए है जैसे शनि और चंद्र ही बैठ जाए तो ऐसे में पति-पत्नी का सम्भोग सुख अच्छा नही होगा या बेडरूम में हमेशा लड़ाई-झगड़े होते रहेंगे l


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आपने देखा होगा जब भी आप किसी ज्योतिष के पास जाते हैं तो वह आपकी पत्रिका देखता है और उसका मूल्यांकन  करके आपको आपके जीवन के उन सभी विषयों के बारे में बताता है जो आप जानना चाहते हैं। शायद कभी आपके मन में यह सवाल भी आया हो कि आखिर क्या है ये जन्म पत्रिका जिसे जन्म कुंडली भी कहते हैं? और कैसे इस पत्रिका को देखकर एक ज्योतिष हमारे जन्म, स्वाभाव, कद काठी, धन, परिवार, पढाई लिखे, नौकरी, प्रेम, शादी, संतान और भी कई तरह की जानकारियां बता सकता है? कैसे एक जन्म पत्रिका हमारे पूरे जीवन का खाका तय कर सकती है और कैसे ये भविष्यवाणियां सही साबित हो सकती है?



इस तरह के कई सवाल हैं जो एक सामान्य मनुष्य के दिमाग में आना स्वाभाविक है अगर वह ज्योतिष विधा के बारे में ज्यादा नहीं जानता। इस आलेख के माध्यम से मेरा प्रयास है कि अगर आपके दिमाग में भी इस तरह के प्रश्न हैं तो उनका उत्तर आपको दे सकूं।



आप सभी एक्स-रे फिल्म के बारे में तो ज़रूर जानते होंगे...जिसके माध्यम से हम शरीर के अंदर किसी भाग कि स्थिति को यथावत देख पाते हैं। हमारी जन्मपत्रिका भी एक तरह कि एक्स-रे फिल्म कि तरह ही है। दरअसल जन्म पत्रिका, हमारे जन्म के समय आकाश या ब्रह्माण्ड में बनने वाली ग्रहों कि स्थिति का एक्स रे या खाका है, जो यह बताता है कि जिस तिथि ,समय और स्थान पर हमारा जन्म हुआ था उस समय ब्रम्हाण्ड के सभी गृह किस स्थिति में थे। और यह खाका ही ग्रहों कि दशा और दिशा के माध्यम से सही तरीके से समझा जाए तो जातक के जीवन कि विभिन्न घटनाओं और पहलुओं को सटीक तरीके से समझा जा सकता है।



जन्मपत्रिका में १२ भाव होते हैं, जो १२ खानों के रूप में नजर आते हैं। इन १२ भावों में प्रत्येक भाव आपके जीवन के विभिन्न महत्वपूर्ण क्षेत्रों को समेटे हुए हैं, जिनमे आप खुद, आपसे जुड़े समस्त संबंध, घर, परिवार, कुटुंब, स्वस्थ्य, शिक्षा, नौकरी, धन, जीवन कि बड़ी घटनाएं जैसे प्रेम, विवाह, संतान, मृत्य, भाग्य, मनोकामनाओं कि पूर्ति शामिल हैं। इन बारहों भावों से मिलकर ही कुंडली संपूर्ण जीवन को प्रदर्शित करती है, जिसमें प्रत्येक भाव में विराजित राशि, उनके स्वामी, दृष्टि और विभिन्न ग्रहों कि स्थिति को देखकर स्थिति, परिस्थिति, शुभ, अशुभ, का अनुमान लगाया जाता है। इसके आलावा ज्योतिष के नियमों का इसमें समावेश कर वास्तविक परिणाम प्राप्त करने में मदद मिलती है।

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Tuesday, June 18, 2019

घर परिवार की खुशहाली के लिए औरतें सुबह उठतकर जरूर करें ये काम


वही ऐसा भी कहा जाता हैं कि जिस घर का​ निर्माण वास्तु के हिसाब से नहीं होता हैं वहां के लोगो को कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ता हैं इसके साथ ही वास्तुशास्त्र में कुछ ऐसी बातें भी बताई गई हैं जिनका महिलाओं के द्वारा पालन करना लाभकारी माना जाता हैं तो आज हम आपको वास्तु शास्त्रों के हिसाब से घर की महिलाओं को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए। इसके बारे में बताने जा रहे हैं तो आइए जानते हैं।
वास्तुशास्त्रों के मुताबिक घर की महिलाओं को सूर्योदय से पहले उठ जाना चाहिए। सुबह उठकर घर की साफ सफाई करने के बाद भगवान की आरती उतारने से घर में मौजूद आलस्य और परेशानियां मीलों दूर हो जाती हैं वही साथ ही घर के लोगो का स्वास्थ्य भी अच्छा बना रहता हैं। घर के मुखिया अगर सुबह उठकर तांबे के लोटे में पानी भरकर, मेन गेट या फिर दरवाजे के आसपास बाहर पानी का छिड़काव करते हैं तो वास्तु के मुताबिक घर में पैसों से संबं​धित परेशानियां दूर हो जाती हैं, वही घर में लक्ष्मी जी का वास भी होता हैं।
वही प्रत्येक शुक्रवार के दिन अगर घर की महिला श्री सूक्त या फिर श्री लक्ष्मी सूक्त का पाठ करती हैं, तो इससे घर में धन लाभ बढ़ जाता हैं अगर आप लक्ष्मी जी के नाम का व्रत भी रखती हैं, तो इससे आपके बच्चों के जीवन में तरक्की की राह भी खुल जाती हैं।
पं: अभिषेक शास्त्री
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Wednesday, June 5, 2019

जन्मपत्रिका

जन्मपत्रिका में राहु -केतु द्वारा निर्मित शुभाशुभ योग
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१ अष्ट लक्ष्मी योग👉 जन्मांग में राहु छठे स्थान में और वृहस्पति केंद्र में हो तो अष्ट लक्ष्मी योग बनता हैं। इस योग के कारण जातक धनवान होता हैं और उसका जीवन सुख शांति के साथ व्यतीत होता हैं।

२ मोक्ष योग👉 जन्मांग में वृहस्पति और केतु का युति दृष्टि सम्बन्ध हो तो मोक्ष योग होता हैं। यदि केतु गुरु की राशी और वृहस्पति उच्च राशी कर्क में हो तो मोक्ष की सम्भावना बढ़ जाती हैं।

३ परिभाषा योग👉 तीसरे छठे, दसवे या ग्यारहवे भाव में राहु शुभ होकर स्थित हो तो परिभाषा योग का निर्माण करता हैं। ऐसा राहु जातक को कई प्रकार की परेशानियों से बचा लेता हैं। इनमे स्थित राहु दुसरे ग्रहों के अशुभ प्रभाव को भी कम करता हैं।

४👉 अरिष्ट भंग योग👉 मेष ,वृष या कर्क लग्न में राहु नवम, दशम या एकादश भाव में स्थित हो तो अरिष्ट भंग योग बनता हैं जो अपने नाम के अनुसार ही कई प्रकार के अरिष्टो का नाश करता हैं।

५ लग्न कारक योग👉 यदि लग्नेश अपनी उच्च राशी या स्वराशी में हो और राहु लग्नेश की राशी में स्थित हो तो लग्न कारक योग बनता हैं। यह योग भी जातक को शुभ फल प्रदान करता हैं।

६ कपट योग👉 जन्मांग में चौथे भाव में शनि और बारहवे भाव में राहु हो तो कपट योग बनता हैं ऐसे जातक पर विश्वास सोच समझकर करना चाहिए।

७ पिशाच योग👉 लग्न में चन्द्र और राहु स्थित हो तो पिशाच योग बनता हैं। ऐसे जातको को नजर दोष ,तंत्र कर्म ,उपरी बाधा के कारण परेशानी होती हैं इन्हे योग्य ज्योतिषाचार्य का परामर्श अवश्य समय रहते प्राप्त कर लेना चाहिए।

८ काल सर्प योग👉 जब राहु और केतु के मध्य सभी ग्रह आ जाये तो काल सर्प योग बनता हैं। यह योग ज्यादातर कष्ट कारक होता हैं २० प्रतिशत यह योग विशेष ग्रह स्थितियों के कारण शुभ फल भी देता हैं।

९ राहु और चन्द्र की युति से चन्द्र ग्रहण योग👉 होने पर चन्द्र मन और कल्पना का कारक होकर पीड़ित होता हैं तब जातक का मन किसी कार्य में नहीलगेगा तो पतन निश्चित हैं ऐसे जातक मानसिक रोग, पागलपन के शिकार भी होते हैं। सूर्य ग्रहण होने पर जातक आत्मिक रूप से परेशां रहता हैं। जातक को राजकीय सेवा में परेशानी रहती हैं और जातक को पिता की तरफ से भी परेशानी रहती हैं।

१० मंगल राहु का योग होने पर👉 जातक की तर्क शक्ति प्रभावित रहती हैं। ऐसा जातक आलसी भी होता हैं जिससे प्रगति नही कर पाता ऐसा जातक हिंसक भी होता हैं अपने क्रोध पर ये नियंत्रण नही कर पाते इनमे वासना भी अधिक रहती हैं।

११ बुध राहु का योग होने पर👉 जड़त्व योग का निर्माण होता हैं यदि बुध कमजोर भी हो तो बुद्धि कमजोरी के कारण प्रगति नही कर पायेगा इस योग वाला जातक सनकी ,चालाक होता हैं कई बार ऐसे जातक भयंकर बीमारी से भी पीड़ित रहते हैं।

१२ गुरु राहू का योग होने पर चांडाल योग👉 का निर्माण होता हैं। गुरु ज्ञान और पुण्य का कारक हैं। यदि जातक शुभ प्रारब्ध के कारण सक्षम होगा तो अज्ञान और पाप प्रभाव के कारण शुभ प्रारब्ध के फल को स्थिर नही रख पायेगा जातक में सात्विक भावना में कमी आ जाती हैं।

१३ शुक्र राहू योग👉 से अमोत्वक योग का निर्माण होता हैं। शुक्र को प्रेम और लक्ष्मी का कारक माना जाता हैं। प्रेम में कमी और लक्ष्मी की कमी सभी असफलताओ का मूल हैं ऐसे जातक में चारित्रिक दोष भी रहता हैं।

१४ शनि राहू योग👉 से नंदी योग बनता हैं। शनि राहू दोनों पृथकता करक ग्रह हैं। इसीलिए इनका प्रभाव जातक को निराशा की और ले जायेगा।

Tuesday, May 28, 2019

सूर्य अर्घ्य



ज्योतिषनुसार सूर्य अर्घ्य के आर्थिक एवं शारीरिक लाभ
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भारतीय शास्त्रों के अनुसाए सूर्य देव को जल चढ़ाना बहुत शुभ माना जाता है. जी हां अक्सर आप अपनी समस्या लेकर जब किसी पंडित के पास जाते है, तो वो सबसे पहले सूर्य को अर्घ देने का उपाय ही सुझाते है. वही अगर किसी व्यक्ति की कुंडली मे सूर्य ग्रह मजबूत हो तो यह माना जाता है, कि वह व्यक्ति काफी गुणवान होता है. साथ ही समाज मे उसका बहुत मान सम्मान भी होता है. इसके इलावा वह बहुत प्रतिष्ठित भी होता है. ऐसे मे कुंडली मे सूर्य ग्रह को मजबूत रखना बेहद जरुरी है।

वैसे महाभारत काल से ऐसा माना जाता है, कि कर्ण नियमित रूप से सूर्य देव की पूजा करते थे और सूर्य को जल का अर्घ भी देते थे. इसके इलावा सूर्य देव की पूजा के बारे मे भगवान् राम की कथा मे भी यह लिखा गया है, कि भगवान् राम हर रोज सूर्य देव की पूजा करते थे और अर्घ देते थे. वैसे कलयुग मे भी ऐसे बहुत से लोग है जो सूर्य देव को जल अर्पित करते है और उनकी पूजा करते है. गौरतलब है, कि सूर्य देव को अगर पूरी विधि के साथ जल चढ़ाया जाये तो इसके परिणाम और भी अच्छे होते है।

यदि हम सूर्य देव को चढाने वाले जल मे कुछ वस्तुए डाल कर उसे अर्पित करे तो इससे सही फल प्राप्त होता है. वैसे सूर्य देव को भी अलग अलग चीजों के लिए जल दिया जाता है. गौरतलब है, कि ज्योतिषशास्त्र मे सूर्य को आत्मा का कारक माना गया है. इसलिए नियमित रूप से सूर्य को जल देने से यह माना जाता है, कि इससे आत्मा की शुद्धि होती है और इससे हमारा आत्म विश्वास भी बढ़ता है. इससे न केवल हमारा मनोबल बढ़ता है, बल्कि यह हमें कई बीमारियों से भी निजात दिलाता है।

इसके इलावा यदि आप शरीर मे कमजोरी महसूस करते है तो सूर्य को नियमित रूप से जल देने से इसका प्रभाव आपके शरीर पर पड़ता है, जिससे आपका शरीर ऊर्जावान बनता है. इससे आपको नौकरी के क्षेत्र मे भी काफी लाभ मिलता है. जैसे यदि किसी को नौकरी की परेशानी हो, तो वो यदि सूर्य को नियमित रूप से जल प्रदान करे तो उसकी यह समस्या समाप्त हो सकती है. साथ ही व्यावसाय मे भी लाभ होता है. इसके इलावा अगर प्रमोशन मे कोई समस्या हो तो उच्च अधिकारियो से सहयोग भी मिल सकता है. इससे आपकी सारी समस्याएं समाप्त हो जाती है. इसलिए सूर्य को हर रोज जल देना काफी फायदेमंद माना जाता है।

मगर सूर्य को जल देते समय इस बात का ध्यान रखे कि स्नान करने के बाद ही सूर्य को जल दे. वैसे सूर्य की उपासना करना कोई नई बात नहीं है. यह परम्परा तो वैदिक काल से चल रही है. इसमें कोई शक नहीं कि सूर्य देव के उदय होने के बाद ही दुनिया से अंधकार खत्म होता है. इससे चारो तरफ रोशनी का प्रकाश हो जाता है. वास्तव मे सूर्य देव के उदय होने के बाद ही मानव, पशु पक्षी सभी अपने अपने कार्यो मे लग जाते है. फिर जैसे ही सूर्य अस्त होता है, हर कोई अपने अपने घर को लौट जाता है. गौरतलब है, कि सूर्य देव को जल अर्पित करते समय कुछ खास बातों का ध्यान रखे. जैसे कि सूर्य को, किसी ताम्बे के लौटे मे जल डाल कर दोनों हाथो से अर्पित करे।

आपको बता दे कि सूर्य देव सभी ग्रहो के राजा कहलाते है. जिस प्रकार ज्योतिष मे माता और मन के कारक चन्द्रमा है, उसी प्रकार पिता और आत्मा के कारक सूर्य है. यहाँ तक कि सभी हिन्दू धार्मिक ग्रंथो में सूर्य देव की महिमा का वर्णन मिलता है. इसके इलावा बहुत कम लोग ये बात जानते है, कि छठ व्रत में सूर्य को दिन में दो बार अर्घ दिया जाता है. सबसे पहले जब सूर्य उदय होता है और फिर जब वह अस्त होता है, तो उसे जल चढ़ाया जाता है. ऐसे में यदि आपकी कुंडली में सूर्य नीच राशि यानि तुला में है. तो इसके अशुभ फल से बचने के लिए आपको हर रोज सूर्य देव को अर्घ देना चाहिए. इसके साथ ही यदि सूर्य किसी अशुभ भाव का स्वामी होकर अशुभ स्थान पर बैठा है. तो उन्हें सूर्य की उपासना करनी चाहिए।

इसके इलावा जिनकी कुंडली में सूर्य देव अशुभ ग्रहो और शनि के राहु केतु के प्रभावों में है. तो ऐसे व्यक्ति को हर रोज नियमानुसार सूर्य देव को जल अर्पित करना चाहिए. यहाँ तक कि बीमारियों को दूर रखने के लिए भी हमें सूर्य की उपासना करनी चाहिए. वही अगर स्किन संबंधी कोई समस्या हो तो आदित्य स्तोत्र का पाठ करना चाहिए. इससे लाभ आवश्य मिलता है. बता दे कि सूर्य देव को जल देने से हमारे जीवन में सभी इच्छाओ की पूर्ति होती है. वैसे सूर्य देव को अर्घ देते समय कुछ ख़ास बातों का ध्यान रखना भी जरुरी है. जैसे सूर्य की पहली किरण को अर्घ देना सबसे ज्यादा फलदायक और उत्तम माना जाता है।

इसके लिए सबसे पहले आप प्रात काल सूर्य उदय होने से पहले उठ जाए और स्नान कर ले. फिर उगते सूर्य के सामने आसन लगा ले. फिर आसन पर खड़े होकर ताम्बे के लौटे में जल डाल कर जल अर्पित करे. इसके बाद रक्त चंदन आदि से युक्त लाल रंग के पुष्प ले. आप लाल रंग का कोई भी पुष्प ग्रहण कर सकते है. इसके इलावा रक्त चन्दन का मतलब है, लाल रंग का चंदन जो इस जल में डाल ले. इसके साथ ही आपको थोड़े से चावल डालने है. इसमें आप भले ही चावल न डाले मगर रक्त चंदन और लाल रंग के पुष्प तो जल में जरूर डालने है और फिर अर्घ देना है. इसमें आप हाथ की मुट्ठी बना कर सूर्य को तीन बार जल अर्पित कर सकते है या सीधा ताम्बे के लौटे में जल डाल कर भी अर्पण कर सकते है।
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हमेशा मंत्र को पढ़ते हुए ही जल अर्पित करना चाहिए और जैसे ही पूर्व दिशा में सूर्य उदय दिखाई दे तो दोनों हाथो से ताम्बे के लौटे में जल डाल कर सूर्य को ऐसे जल दे जैसे कि सूर्य की किरणे पानी की धार से आपको साफ़ दिखाई दे। इसके साथ ही इस बात का ध्यान रखे कि जो जल आप सूर्य देव को अर्पण कर रहे है, वो आपके पैरो में नहीं आना चाहिए. ऐसे में अगर सम्भव हो सके तो एक बर्तन जरूर रख ले, ताकि जो जल आप अर्पण कर रहे है, वो आपके पैरो को न छू सके. इसके बाद उस बर्तन में एकत्रित हुआ जल आप किसी भी पौधे में डाल सकते है।

इसके इलावा यदि आपको सूर्य भगवान् के दर्शन न हो तो रोज की तरह पूर्व दिशा में मुँह करके किसी शुद्ध स्थान पर आप जल अर्पित कर सकते है. मगर जिस रास्ते से लोगों का आना जाना हो, वहां भूल कर भी जल अर्पित न करे. गौरतलब है, कि जल अर्पण करने के बाद दोनों हाथो से उस भूमि को स्पर्श करे और गला. आंख, कान को छूकर भगवान् सूर्य देव को झुक कर प्रणाम करे. इसके साथ ही अर्घ देते समय आपको किसी एक सूर्य मंत्र का मन ही मन में उच्चारण जरूर करना चाहिए. फिर सीधे हाथ में जल लेकर उसे चारो तरफ छिड़कना चाहिए।

सूर्य देव के 12 नाम
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1.    ऊँ मित्राय: नमः
2.    ऊँ रवये नमः
3.    ऊँ सूर्यायः नमः
4.    ऊँ भानवे नमः
5.    ऊँ खगय नमः
6.    ऊँ पुष्णे नमः
7.    ऊँ हिरण्यगर्भाय नमः
8.    ऊँ मारिचाये नमः
9.    ऊँ आदित्याय नमः
10.  ऊँ सावित्रे नमः
11.  ऊँ आर्काय नमः
12.  ऊँ भास्कराय नमः

इसके बाद जहाँ आप खड़े होकर जल अर्पित कर रहे है, उसी स्थान पर तीन बार घूम कर परिक्रमा कर ले और जहाँ आपने खड़े होकर सूर्य देव की पूजा की है वहां प्रणाम भी करे. वैसे आपको बता दे कि सूर्य देव का एक मंत्र तो यह है. ॐ सूर्याय नम:. इसके इलावा सूर्य को जल चढाने का उद्देश्य केवल सूर्य देव को प्रसन्न करना या यश की प्राप्ति करना नहीं है. इससे हमारे स्वास्थ्य को भी लाभ मिलता है. जब सुबह उठ कर ताज़ी हवा और सूर्य की किरणे हमारे शरीर में प्रवेश करती है, तो हमारा स्वास्थ्य भी हमेशा सही रहता है. इसके इलावा जब पानी की धारा में से सूर्य को किरणों को देखते है, तो इससे हमारी आँखों की रौशनी भी तेज होती है.
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बता दे कि सूर्य की किरणों में विटामिन दी भरपूर मात्रा में होता है. इसलिए जो व्यक्ति सुबह उठ कर सूर्य को जल देता है, वह तेजस्वी बनता है. साथ ही इससे त्वचा में आकषर्ण और चमक आ जाती है. एक तरफ जहाँ पेड़ पौधों को भोजन की प्राप्ति भी सूर्य की किरणों से होती है, वही दूसरी तरफ ऋषि मुनियो का कहना है, कि सूर्य हमारे शरीर से हानिकारक तत्वों को नष्ट कर देता है. बस सूर्य को जल अर्पित करते समय इस बात का ध्यान रखे कि इसे कभी भी सीधे न देखे बल्कि जल के बीच में से देखे.

इसके इलावा सूर्य को 7 या 8 बजे तक जल चढ़ा दे. वो इसलिए क्यूकि देर से चढ़ाया गया जल हानिकारक भी हो सकता है. इसके साथ ही हमेशा ध्यान रखे कि जल में रक्त चंदन और लाल पुष्प हमेशा डाले. यदि यह न हो तो आप लाल मिर्च के कुछ बीज भी डाल सकते है. यह तंत्र विद्या के काम आते है. तो अब आगे से आप जब भी सूर्य देव को अर्घ दे तो इन बातों का खास ध्यान रखे।
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पं: अभिषेक शास्त्री
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Gajendra Moksha

 
     
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         ‼️Gajendra Moksha- Significance ‼️
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The Bhagwat has many Kathas which explain some very important deep meanings to life and sufferings.Many of them are also indicative of Astrology or guidance to dealing with difficulties in life.

Gajendra Moksha is a story of an elephant who was the king in his forest. While drinking water from the Lake he is suddenly attacked by a crocodile. He tries his best but he is not able to get his foot out of the crocodile s mouth. He is stuck and caught, the pain is immense and unbearable. When he just cannot take the suffering anymore he calls out to Vishnu.
 His prayer is a powerful, beautiful stotra which can be chanted by anyone to relieve themselves of sufferings. Finally, Vishnu appears and takes Ganjendra with him to Vishnu Lok and all his suffering is over and he finds emancipation.
This Katha is symbolic in many ways and is filled with spiritual guidance and knowledge. The elephant can be understood as the intellect ( elephant – Jupiter – intelligence). The muddy water can be the illusions or lack of clarity while we live in this world. The crocodile is symbolic of the nodes- Rahu and Ketu- or the various vices created by own mind which confuses us and takes us away from real knowledge. We are caught up ( as caught by the crocodile) so intensely in the weaknesses of our mind that we live in pain, disillusionment, fear, attachments leading to us being stuck in the circle of life and death.
The Gajendra Moskha Stotra hence becomes a powerful Stotra to pull the soul towards Vishnu, towards emancipation and free of all suffering. It also indicates that when the suffering is at the soul level- Atma Karak- this Stotra will bring relief. The chanting of this Stotra also frees one from the sufferings of the Nodes when the transit is not favourable.
Apart from this powerful prayer Vishnu Sashartanam will also help with guidance and blessings.
- pt. Abhishek shastri
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Friday, May 10, 2019

How do karma ?


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We know very well. We will get the fruits of our deeds, yet we can not do good deeds, either You can say that if the fruit of the action done by us is not conducive to our situation then what will you do in Like this..........?
Message directly on Whatsapp with your horoscope details.
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Thank you. 
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Thursday, May 9, 2019

काले तिल के टोटके


काले तिल के 7 चमत्कारिक टोटके
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कार्यों में आ रही परेशानियों और दुर्भाग्य को दूर करने के लिए ज्योतिष शास्त्र की किताबों में कई तरह के टोटके या उपाय बताए गए हैं उन्हीं में से एक है काले तिल के असरकार और चमत्कारिक उपाय। आप भी जानिए...

1👉 राहु-केतु और शनि से मुक्ति हेतु
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कुंडली में शनि के दोष हों या शनि की साढ़ेसाती या ढय्या चल रहा हो तो प्रत्येक शनिवार को बहते जल की नदी में काले तिल प्रवाहित करना चाहिए। इस उपाय से शनि के दोषों की शांति होती है।आप काले तिल भी दान कर सकते हैं। इससे राहु-केतु और शनि के बुरे प्रभाव समाप्त हो जाते हैं। इसके अलावा कालसर्प योग, साढ़ेसाती, ढय्या, पितृदोष आदि में भी यह उपाय कारगर है।

2.👉 धन की समस्या दूर करने हेतु 
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 हर शनिवार काले तिल, काली उड़द को काले कपड़े में बांधकर किसी गरीब व्यक्ति को दान करें। इस उपाय से पैसों से जुड़ी समस्याएं दूर हो सकती हैं।
धनहानि रोकने हेतु : मुठ्ठी भर काले तिल को परिवार के सभी सदस्यों के सिर पर सात बार उसारकर घर के उत्तर दिशा में फेंक दें, धनहानि बंद होगी| 

 3.👉 बुरे समय से मुक्ति हेतु   
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 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का जप करते हुए प्रत्येक शनिवार को दूध में काले तिल मिलाकर पीपल पर चढ़ाएं। इससे कैसा भी बुरा वक्त चल रहा होगा तो वह दूर हो जाएगा।         
                 
4.👉 रोग कटे सुख मिले
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हर रोज एक लोटे में शुद्ध जल भरें और उसमें काले तिल डाल दें। अब इस जल को शिवलिंग पर ऊँ नम: शिवाय मंत्र जप करते हुए चढ़ाएं। जल पतली धार से चढ़ाएं और मंत्र का जप करते रहें। जल चढ़ाने के बाद फूल और बिल्व पत्र चढ़ाएं। इससे शनि के दोष तो शांत होंगे ही पुराने समय से चली आ रही बीमारियां भी दूर हो सकती हैं। दूसरा उपाय यह है कि शनिवार को यह उपय करें। जौ का 125 पाव (सवा पाव) आटा लें। उसमें साबुत काले तिल मिलाकर रोटी बनाएं। अच्छी तरह सेंके, जिससे वे कच्ची न रहें। फिर उस पर थोड़ा-सा तिल्ली का तेल और गुड़ डाल कर पेड़ा बनाएं और एक तरफ लगा दें। फिर उस रोटी को बीमार व्यक्ति के ऊपर से 7 बार वार कर किसी भैंसे को खिला दें। पीछे मुड़ कर न देखें और न कोई आवाज लगाए। भैंसा कहां मिलेगा, इसका पता पहले ही मालूम करके रखें। भैंस को रोटी नहीं खिलानी है।

 5.👉 कार्य में सफलता हेतु 
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अपने हाथ में एक मुट्ठी काले तिल लेकर घर से निकलें। मार्ग में जहां भी कुत्ता दिखाई दे उस कुत्ते के सामने वह तिल डाल दें और आगो बढ़ जाए। यदि वह काले तिल कुत्ता खाता हुआ दिखाई दे तो यह समझना चाहिए कि कैसा भी कठिन कार्य क्यों न हो, उसमें सफलता प्राप्त होगी।           

6.👉 नजरदोष   
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जब कभी किसी छोटे बच्चों को नजर लग जाती है तो, वह दूध उलटने लगता है और दूध पीना बन्द कर देता है, ऐसे में परिवार के लोग चिंतित और परेशान हो जाते है। ऐसी स्थिति में एक बेदाग नींबू लें और उसको बीच में आधा काट दें तथा कटे वाले भाग में थोड़े काले तिल के कुछ दाने दबा दें। और फिर उपर से काला धागा लपेट दें। अब उसी नींबू को बालक पर उल्टी तरफ से 7 बार उतारें। इसके पश्चात उसी नींबू को घर से दूर किसी निर्जन स्थान पर फेंक दें। इस उपाय से शीघ्र ही लाभ मिलेगा।
                 
7.👉 आयु वृद्धि
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मंगल या शनिवार के दिन काले तिल, जौ का पीसा हुआ आटा और तेल मिश्रित करके एक रोटी पकावें, उसे अच्छी तरह से दोनों तरफ से सेकें, फिर उस पर तेल मिश्रित गुड़ चुपड़ कर व्यक्ति पर सात बार वारकर भैंसे को खिलावें।
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Wednesday, May 8, 2019

*धन-नाश योग--*

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*ज्योतिष शास्त्र के अनुसार मंगल ग्रह को कर्ज का कारक ग्रह माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार मंगलवार को कर्ज लेना निषेध माना गया है। वहीं  बुधवार को कर्ज देना अशुभ है क्योंकि बुधवार को दिया गया कर्ज कभी नही मिलता। मंगलवार को कर्ज लेने वाला जीवनभर कर्ज नहीं चुका पाता तथा उस व्यक्ति की संतान भी इस वजह परेशानियां उठाती हैं।जन्म कुंडली के छठे भाव से रोग, ऋण, शत्रु, ननिहाल पक्ष, दुर्घटना का अध्ययन किया जाता है| ऋणग्रस्तता के लिए इस भाव के आलावा दूसरा भाव जो धन का है, दशम-भाव जो कर्म व रोजगार का है, एकादश भाव जो आय का है एवं द्वादश भाव जो व्यय भाव है, का भी अध्ययन किया जाता है| इसके आलावा ऋण के लिए कुंडली में मौजूद कुछ योग जैसे सर्प दोष व वास्तु दोष भी इसके कारण बनते हैं| इस भाव के कारक ग्रह शनि व मंगल हैं|*
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*दूसरे भाव का स्वामी बुध यदि गुरु के साथ अष्टम भाव में हो तो यह योग बनता है| जातक पिता के कमाए धन से आधा जीवन काटता है या फिर ऋण लेकर अपना जीवन यापन करता है| सूर्य लग्न में शनि के साथ हो तो जातक मुकदमों में उलझा रहता है और कर्ज लेकर जीवनयापन व मुकदमेबाजी करता रहता है| 12 वें भाव का सूर्य व्ययों में वृद्धि कर व्यक्ति को ऋणी रखता है| अष्टम भाव का राहू दशम भाव के माध्यम से दूसरे भाव पर विष-वमन कर धन का नाश करता है और इंसान को ऋणी होने के लिए मजबूर कर देता है| इनके आलावा कुछ और योग हैं जो व्यक्ति को ऋणग्रस्त बनाते हैं|*

*उपर बताएं पाप ग्रह अगर मंगल को देख रहे हों तो भी कर्जा होता है।*

*कुंडली में खराब फल देने वाले घरों (छठे, आठवें या बारहवें) घर में कर्क राशि के साथ हो तो व्यक्ति का कर्ज लंबे समय तक बना रहता है।*

*षष्ठेश पाप ग्रह हो व 8 वें या 12 वें भाव में स्थित हो तो व्यक्ति ऋणग्रस्त रहता है|*

*छठे भाव का स्वामी हीन-बली होकर पापकर्तरी में हो या पाप ग्रहों से देखा जा रहा हो|*

*अगर कुंडली में मंगल कमजोर हो यानि कम अंश का हो तो ऋण लेने की स्थिति बनती है।*

*अगर मंगल कुंडली में शनि, सूर्य या बुध आदि पापग्रहों के साथ हो तो व्यक्ति को जीवन में एक बार ऋण तो लेना ही पड़ता है।*

*दूसरा व दशम भाव कमजोर हो, एकादश भाव में पाप ग्रह हो या दशम भाव में सिंह राशि हो, ऐसे लोग कर्म के     प्रति अनिच्छुक होते हैं|*

*यदि व्यक्ति का 12 वां भाव प्रबल हो व दूसरा तथा दशम कमजोर तो जातक उच्च स्तरीय व्यय वाला होता है और 5. निरंतर ऋण लेकर अपनी जरूरतों की पूर्ति करता है|*

*आवास में वास्तु-दोष-पूर्वोत्तर कोण में निर्माण हो या उत्तर दिशा का निर्माण भारी व दक्षिण दिशा का निर्माण हल्का हो तो व्यक्ति के व्यय अधिक होते हैं और ऋण लेना ही पड़ता है|*

*कर्ज और वार का संबंध —*

*सोमवार- सोमवार की अधिष्ठाता देवी पार्वती हैं। यह चर संज्ञक और शुभ वार है। इस वार को किसी भी प्रकार का कर्ज लेने-देने में हानि नहीं होती है।*

*मंगलवार- मंगलवार के देवता कार्तिकेय हैं। यह उग्र एवं क्रूर वार है। इस वार को कर्ज लेना शास्त्रों में निषेध बताया गया है। इस दिन कर्ज लेने के बजाए पुराना कर्ज हो तो चुका देना चाहिए।*

*बुधवार- बुधवार के देवता विष्णुहैं। यह मिश्र संज्ञक शुभ वार है, मगर ज्योतिष की भाषा में इसे नपुंसक वार माना गया है। यह गणेशजी का वार है। इस दिन कर्ज देने से बचना चाहिए।*

*गुरुवार- गुरुवार के देवता ब्रह्माहैं। यह लघु संज्ञक शुभ वार है। गुरुवार को किसी को भी कर्ज नहीं देना चाहिए, लेकिन इस दिन कर्ज लेने से कर्ज जल्दी उतरता है।*

*शुक्रवार- शुक्रवार के देवता इन्द्र हैं। यह मृदु संज्ञक और सौम्य वार है। कर्ज लेने-देने दोनों दृष्टि से अच्छा वार है।*

*शनिवार- शनिवार के देवता काल हैं। यह दारुण संज्ञक क्रूर वार है। स्थिर कार्य करने के लिए ठीक है, परंतु कर्ज लेन-देने के लिए ठीक नहीं है। कर्ज विलंब से चुकता है।*

*रविवार- रविवार के देवता शिव हैं। यह स्थिर संज्ञक और क्रूर वार है। रविवार को न तो कर्ज दें और न ही कर्ज लें।*

*कर्ज के पिंड से छुटकारा नहीं हो रहा हो तो प्रत्येक बुधवार को गणेशजी के सम्मुख तीन बार ‘ऋणहर्ता गणेश स्तोत्र’ का पाठ करें और यथाशक्ति पूजन करें।*

*धनहीनता के ज्योतिष योग—*

*ज्योतिष में फलित करते समय योगों का विशेष योगदान होता है। योग एक से अधिक ग्रह जब युति, दृष्टि, स्थिति वश संबंध बनाते हैं तो योग बनता है। योग कारक ग्रहों की महादशा, अन्तर्दशा व प्रत्यन्तर दशादि में योगों का फल मिलता है। योग को समझे बिना फलित व्यर्थ है। योग में योगकारक ग्रह का महत्वपूर्ण भूमिका होती है। योगकाकर ग्रह के बलाबल से योग का फल प्रभावित होता है। अब यहां ज्योतिष योगों कि चर्चा करेंगे जो इस प्रकार हैं।धनहानि किसी को भी अच्छी नहीं लगती है। आज उन ज्योतिष योगों की चर्चा करेंगे जो धनहानि या धनहीनता कराते हैं। कुछ योग इस प्रकार हैं-*

*धनेश  छठे, आठवें एवं बारहवें भाव में हो या भाग्येश बारहवें भाव में हो तो जातक करोड़ों कमाकर भी निर्धन रहता है। ऐसे जातक को धन के लिए अत्यन्त संघर्ष करना पड़ता है। उसके पास धन एकत्रा नहीं होता है अर्थात्‌ दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि धन रुकता नहीं है।*

*जातक की कुंडली में धनेश अस्त या नीच राशि में स्थित हो तथा द्वितीय व आठवें भाव में पापग्रह हो तो जातक सदैव कर्जदार रहता है।*

*जातक की कुंडली में धन भाव में पापग्रह स्थित हों। लग्नेश द्वादश भाव में स्थित हो एवं लग्नेश नवमेश एवं लाभेश(एकादश का स्वामी) से युत हो या दृष्ट हो तो जातक के ऊपर कोई न कोई कर्ज अवश्य रहता है।*

*किसी की कुंडली में लाभेश छठे, आठवें एवं बारहवें भाव में हो तो जातक निर्धन होता है। ऐसा जातक कर्जदार, संकीर्ण मन वाला एवं कंजूस होता है। यदि लग्नेश भी निर्बल हो तो जातक अत्यन्त निर्धन होता है।*

*षष्ठेश एवं लाभेश का संबंध दूसरे भाव से हो तो जातक सदैव ऋणी रहता है। उसका पहला ऋण उतरता नहीं कि दूसरा चढ़ जाता है। यह योग वृष, वृश्चिक, मीन लग्न में पूर्णतः सत्य सिद्ध होते देखा गया है।*

*धन भाव में पाप ग्रह हों तथा धनेश भी पापग्रह हो तो ऐसा जातक दूसरों से ऋण लेता है। अब चाहे वह किसी करोड़पति के घर ही क्यों न जन्मा हो।*

*किसी जातक की कुंडली में चन्द्रमा किसी ग्रह से युत न हो तथा शुभग्रह भी चन्द्र को न देखते हों व चन्द्र से द्वितीय एवं बारहवें भाव में कोई ग्रह न हो तो जातक दरिद्र होता है। यदि चन्द्र निर्बल है तो जातक स्वयं धन का नाश करता है। व्यर्थ में देशाटन करता है और पुत्रा एवं स्त्राी संबंधी पीड़ा जातक को होती है।*

*यदि कुंडली में गुरु से चन्द्र छठे, आठवें या बारहवें हो एवं चन्द्र केन्द्र में न हो तो जातक दुर्भाग्यशाली होता है और उसके पास धन का अभाव होता है। ऐसे जातक के अपने ही उसे धोखा देते हैं। संकट के समय उसकी सहायता नहीं करते हैं। अनेक उतार-चढ़ाव जातक के जीवन में आते हैं।*

*यदि लाभेश नीच, अस्त य पापग्रह से पीड़ित होकर छठे, आठवें या बारहवें भाव में हो तथा धनेश व लग्नेश निर्बल हो तो ऐसा जातक महा दरिद्र होता है। उसके पास सदैव धन की कमी रहती है। सिंह एवं कुम्भ लग्न में यह योग घटित होते देखा गया है।*

*यदि किसी जातक की कुण्डली में दशमेश, तृतीयेश एवं भाग्येश निर्बल, नीच या अस्त हो तो ऐसा जातक भिक्षुक, दूसरों से धन पाने की याचना करने वाला होता है।*

*किसी कुण्डली में मेष में चन्द्र, कुम्भ में शनि, मकर में शुक्र एवं धनु में सूर्य हो तो ऐसे जातक के पिता एवं दादा द्वारा अर्जित धन की प्राप्ति नहीं होती है। ऐसा जातक निज भुजबल से ही धन अर्जित करता है और उन्नति करता है।*

*यदि कुण्डली का लग्नेश निर्बल हो, धनेश सूर्य से युत होकर द्वादश भाव में हो तथा द्वादश भाव में नीच या पापग्रह से दृष्ट सूर्य हो तो ऐसा जातक राज्य से दण्ड स्वरूप धन का नाश करता है। ऐसा जातक मुकदमें धन हारता है। यदि सरकारी नौकरी में है तो अधिकारियों द्वारा प्रताड़ित या नौकरी से निकाले जाने का भय रहता है। वृश्चिक लग्न में यह योग अत्यन्त सत्य सिद्ध होता देखा गया है।*

*यदि धनेश एवं लाभेश छठे, आठवें, बारहवें भाव में हो एवं एकादश में मंगल एवं दूसरे राहु हो तो ऐसा जातक राजदण्ड के कारण धनहानि उठाता है। वह मुकदमे, कोर्ट व कचहरी में मुकदमा हारता है। अधिकारी उससे नाराज रहते हैं। उसे इनकम टैक्स से छापा लगने का भय भी रहता है।*
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*मूलत- धनेश, लाभेश, दशमेश, लग्नेश एवं भाग्येश निर्बल हो तो धनहीनता का योग बनता है।उक्त धनहीनता के योग योगकारक ग्रहों की दशान्तर्दशा में फल देते हैं। फल कहते समय दशा एवं गोचर का विचार भी कर लेना चाहिए।*
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