Wednesday, December 20, 2017

*💥 कुंडली में द्वितीय भाव-💥*

*कुंडली के दूसरे घर को भारतीय वैदिक ज्योतिष में धन स्थान कहा जाता है तथा किसी भी व्यक्ति की कुंडली में इस घर का अपना एक विशेष महत्त्व होता है। इसलिए किसी कुंडली को देखते समय इस घर का अध्ययन बड़े ध्यान से करना चाहिए। कुंडली का दूसरा घर कुंडली धारक के द्वारा अपने जीवन काल में संचित किए जाने वाले धन के बारे में बताता है तथा इसके अतिरिक्त यह घर कुंडली धारक के  द्वारा संचित किए जाने वाले सोना, चांदी, हीरे-जवाहरात तथा इसी प्रकार के अन्य बहुमूल्य पदार्थों के बारे में भी बताता है। किन्तु कुंडली का दूसरा घर केवल धन तथा अन्य बहुमूल्य पदार्थों तक ही सीमित नहीं है तथा इस घर से कुंडली धारक के जीवन के और भी बहुत से क्षेत्रों के बारे में जानकारी मिलती है।*

 *कुंडली का दूसरा घर व्यक्ति के बचपन के समय परिवार में हुई उसकी परवरिश तथा उसकी मूलभूत शिक्षा के बारे में भी बताता है। कुंडली के दूसरे घर के मजबूत तथा बुरे ग्रहों की दृष्टि से रहित होने की स्थिति में कुंडली धारक की बाल्यकाल में प्राप्त होने वाली शिक्षा आम तौर पर अच्छी रहती है। किसी भी व्यक्ति के बाल्य काल में होने वाली घटनाओं के बारे में जानने के लिए इस घर का ध्यानपूर्वक अध्ययन करना आवश्यक है। कुंडली के दूसरे घर से कुंडली धारक की खाने-पीने से संबंधित आदतों का भी पता चलता है। किसी व्यक्ति की कुंडली के दूसरे घर पर नकारात्मक शनि का बुरा प्रभाव उस व्यक्ति को अधिक शराब पीने की लत लगा सकता है तथा दूसरे घर पर नकारात्मक राहु का बुरा प्रभाव व्यक्ति को सिगरेट तथा चरस, गांजा जैसे नशों की लत लगा सकता है।*

 *कुंडली का दूसरा घर व्यक्ति के वैवाहिक जीवन के बारे में भी बताता है तथा इस घर से विशेष रूप से वैवाहिक जीवन की पारिवारिक सफलता या असफलता तथा कुटुम्ब के साथ रिश्तों तथा निर्वाह का पता चलता है। हालांकि कुंडली का दूसरा घर सीधे तौर पर व्यक्ति के विवाह होने का समय नहीं बताता किन्तु शादी हो जाने के बाद उसके ठीक प्रकार से चलने या न चलने के बारे में इस घर से भी पता चलता है। कुंडली के इसी घर से कुंडली धारक के वैवाहिक जीवन में अलगाव अथवा तलाक जैसी घटनाओं का आंकलन भी किया जाता है तथा व्यक्ति के दूसरे विवाह के योग देखते समय भी कुंडली के इस घर को बहुत महत्त्व दिया जाता है। इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति के वैवाहिक जीवन से जुड़े कई महत्त्वपूर्ण पक्षों के बारे में कुंडली के दूसरे घर से जानकारी प्राप्त होती है।*

  *कुंडली का दूसरा घर धारक की वाणी तथा उसके बातचीत करने के कौशल के बारे में भी बताता है। शरीर के अंगों में यह घर चेहरे तथा चेहरे पर उपस्थित अंगों को दर्शाता है तथा कुंडली के इस घर पर एक या एक से अधिक बुरे ग्रहों का प्रभाव होने की स्थिति में कुंडली धारक को शरीर के इन अंगों से संबंधित चोटों अथवा बीमारियों का सामना करना पड़ सकता है। कुंडली का दूसरा घर धारक की सुनने, बोलने तथा देखने की क्षमता को भी दर्शाता है तथा इन सभी के ठीक प्रकार से काम करने के लिए कुंडली के इस घर का मज़बूत होना आवश्यक है।*

 *कुंडली के दूसरे घर से धारक के धन कमाने की क्षमता तथा उसकी अचल सम्पत्तियों जैसे कि सोना, चांदी, नकद धन तथा अन्य बहुमूल्य पदार्थों के बारे में भी पता चलता है। कुंडली के इस घर पर किन्ही विशेष बुरे ग्रहों का प्रभाव कुंडली धारक को जीवन भर कर्जा उठाते रहने पर मजबूर कर सकता है तथा कई बार यह कर्जा व्यक्ति की मृत्यु तक भी नहीं उतर पाता।*
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Thursday, October 19, 2017

.        ।। 🕉 ।।
    🌞 *सुप्रभातम्* 🌞
 ««« *आज का पंचांग* »»»
कलियुगाब्द.................5119
विक्रम संवत्...............2074
शक संवत्..................1939
मास.........................कार्तिक
पक्ष............................कृष्ण
तिथी....................अमावस्या
रात्रि 12.42 पर्यंत पश्चात प्रतिपदा
रवि.....................दक्षिणायन
सूर्योदय..........06.25.15 पर
सूर्यास्त..........05.58.03 पर
तिथि स्वामी...........विश्वदेव
नित्यदेवी.....................चित्रा
नक्षत्र...........................हस्त
प्रातः 07.26 पर्यंत पश्चात चित्रा
योग...........................वैधृति
दोप 03.58 पर्यंत पश्चात विषकुम्भ
करण........................चतुष्पद
दोप 12.24 पर्यंत पश्चात नाग
ऋतु.............................शरद
दिन...........................गुरुवार

🇬🇧 *आंग्ल मतानुसार* :-
19 अक्तूबर सन 2017 ईस्वी ।

*श्री महालक्ष्मी पूजन - महाकाली पूजा |*

दीपावली पर्व का पौराणिक महत्व...

* त्रेतायुग में भगवान राम जब रावण को हराकर अयोध्या वापस लौटे, तब श्रीराम के आगमन पर दीप जलाकर उनका स्वागत किया गया और खुशियां मनाई गईं।

* यह भी कथा प्रचलित है जब श्रीकृष्ण ने आततायी नरकासुर जैसे दुष्ट का वध किया, तब ब्रजवासियों ने अपनी प्रसन्नता दीपों को जलाकर प्रकट की।

* राक्षसों का वध करने के लिए मां देवी ने महाकाली का रूप धारण किया। राक्षसों का वध करने के बाद भी जब महाकाली का क्रोध कम नहीं हुआ, तब भगवान शिव स्वयं उनके चरणों में लेट गए। भगवान शिव के शरीर के स्पर्श मात्र से ही देवी महाकाली का क्रोध समाप्त हो गया। इसी की याद में उनके शांत रूप लक्ष्मी की पूजा की शुरुआत हुई। इसी रात इनके रौद्र रूप काली की पूजा का ही विधान है।



* विष्णु ने तीन पग में तीनों लोकों को नाप लिया। राजा बलि की दानशीलता से प्रभावित होकर भगवान विष्णु ने उन्हें पाताल लोक का राज्य दे दिया, साथ ही यह भी आश्वासन दिया कि उनकी याद में भू-लोकवासी प्रत्येक वर्ष ‍दीपावली मनाएंगे।



* अमृतसर के स्वर्ण मंदिर का निर्माण भी दीपावली के ही दिन शुरू हुआ था।
अवसान लिया। इन्होंने आर्य समाज की स्थापना की।

*दीपावली पूजन मुहूर्त विचार :*
लक्ष्मी पूजा को करने के लिए चौघड़िया मुहूर्त देखना उपयुक्त नहीं क्योंकि वे मुहूर्त यात्रा के लिए उपयुक्त होते हैं। लक्ष्मी पूजा के लिए सबसे उपयुक्त समय *प्रदोष काल* के दौरान होता है जब *स्थिर लग्न* प्रचलित होती है। ऐसा माना जाता है कि अगर स्थिर लग्न के दौरान लक्ष्मी पूजा की जाये तो लक्ष्मीजी घर में ठहर जाती है। इसीलिए लक्ष्मी पूजा के लिए यह समय सबसे उपयुक्त होता है। वृषभ लग्न को स्थिर माना गया है और दीवाली के त्यौहार के दौरान यह अधिकतर प्रदोष काल के साथ अधिव्याप्त होता है।

*प्रदोष काल मुहूर्त (सर्वश्रेष्ठ) :-*
लक्ष्मी पूजा मुहूर्त = संध्या 07.26 से 08:25 तक
अवधि = 0 घण्टे 58 मिनट्स
प्रदोष काल = संध्या 05.54 से 08:25 तक
वृषभ काल = संध्या 07.26 से 09.24 तक

👁‍🗨 *राहुकाल* :-
दोपहर 01.36 से 03.02 तक ।

🚦 *दिशाशूल* :-
दक्षिणदिशा -
यदि आवश्यक हो तो दही या जीरा का सेवन कर यात्रा प्रारंभ करें।

☸ शुभ अंक.................1
🔯 शुभ रंग................पीला

✡ *चौघडिया* :-
प्रात: 06.28 से 07.53 तक शुभ
प्रात: 10.45 से 12.11 तक चंचल
दोप. 12.11 से 01.36 तक लाभ
दोप. 01.36 से 03.02 तक अमृत
सायं 04.28 से 05.54 तक शुभ
सायं 05.54 से 07.28 तक अमृत
रात्रि 07.28 से 09.02 तक चंचल |

💮 *आज का मंत्र* :-
*लक्ष्मी बीज मंत्र :-*
।। ॐ ह्रीं श्रीं लक्ष्मीभयो नमः।।

*महालक्ष्मी मंत्र :-*
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्मयै नम:॥

*लक्ष्मीगायत्री मंत्र :-*
ॐ श्री महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णु पत्न्यै च धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात् ॐ॥

📢 *सुभाषितम्* :-
*अष्टावक्र गीता - अष्टादश अध्याय :-*
अकुर्वन्नपि संक्षोभाद्
व्यग्रः सर्वत्र मूढधीः।
कुर्वन्नपि तु कृत्यानि
कुशलो हि निराकुलः॥१८- ५८॥
अर्थात :- अज्ञानी पुरुष कुछ न करते हुए भी क्षोभवश सदा व्यग्र ही रहता है। योगी पुरुष बहुत से कार्य करता हुआ भी शांत रहता है॥५८॥


⚜ *आज का राशिफल* :-

*राशि फलादेश मेष* :-
रोजगार प्राप्ति के प्रयास सफल रहेंगे। जमीन-जायदाद संबंधी बाधा दूर होकर लाभ की स्थिति बनेगी। चिंता रहेगी।

🐂 *राशि फलादेश वृष* :-
रचनात्मक कार्य सफल रहेंगे। स्वादिष्ट भोजन का आनंद मिलेगा। व्यवसाय ठीक चलेगा। जल्दबाजी न करें। वाहनादि चलाते समय सावधानी रखें।

*राशि फलादेश मिथुन* :-
बुरी सूचना मिल सकती है। बेचैनी रहेगी। चिंता बनी रहेगी। दौड़धूप अधिक होगी। शांति बनाए रखें। आजीविका के क्षेत्र में लाभ होगा।

🦀 *राशि फलादेश कर्क* :-
प्रयास सफल रहेंगे। काम की प्रशंसा होगी। धन प्राप्ति सुगम होगी। विवाद न करें। कुसंगति से बचें। जमीन संबंधी विवाद की आशंका रहेगी।

🦁 *राशि फलादेश सिंह* :-
प्रतिद्वंद्वी सक्रिय रहेंगे। उत्साहवर्धक सूचना मिलेगी। पुराने संगी-साथी मिलेंगे। मान-सम्मान मिलेगा। अप्रिय समाचार मानसिक अस्थिरता बढ़ाएगा।

🏻 *राशि फलादेश कन्या* :-
प्रेम-प्रसंग में अनुकूलता रहेगी। बेरोजगारी दूर होगी। नौकरी, निवेश व यात्रा मनोनुकूल लाभ देंगे। आप प्रसन्न व उत्साहित रहेंगे।

⚖ *राशि फलादेश तुला* :-
विवाद न करें। जल्दबाजी घातक सिद्ध हो सकती है। कानूनी अड़चन सामने आएगी। फालतू खर्च होगा।कोई रुका काम बनने से प्रसन्नता होगी।

🦂 *राशि फलादेश वृश्चिक* :-
रुका हुआ धन मिल सकता है। व्यावसायिक यात्रा सफल रहेगी। उन्नति होगी। चिंता बनी रहेगी। अधिकारियों का विश्वास हासिल करेंगे।

🏹 *राशि फलादेश धनु* :-
कार्यस्थल पर सुधार होगा। योजना फलीभूत होगी। पूछ-परख बढ़ेगी। निवेश व यात्रा मनोनुकूल रहेंगे। लाभदायी योजनाएं हाथ में आएंगी।

🐊 *राशि फलादेश मकर* :-
अध्यात्म में आस्था बढ़ेगी। कानूनी सहायता मिलेगी। धन प्राप्ति सुगम होगी। घर में अशांति रहेगी। आपके द्वारा लिए निर्णय लाभप्रद रहेंगे।

🏺 *राशि फलादेश कुंभ* :-
चोट, चोरी व विवाद से हानि संभव है। कुसंगति से हानि होगी। जोखिम व जमानत के कार्य टालें। आवेश पर नियंत्रण रखें।

*राशि फलादेश मीन* :-
कानूनी बाधा दूर होगी। घर में प्रसन्नता रहेगी। धनलाभ होगा। ईष्ट मित्रों से मुलाकात होगी। लाभ होगा। नए अवसर प्राप्त होंगे।

☯नारायण ज्योतिष परामर्श
की ओर से,, आप सभी को दीपोत्सव पर खूब खूब बधाई... माँ महालक्ष्मी, श्री गणेश एवं माँ सरस्वती आपके मनवांछित को प्रदान करे |

- सदैव आपका
ज्ञान जी

।। *शुभम भवतु* ।।

Tuesday, October 17, 2017

नारियल के प्रयोग

नारियल के प्रयोग
द्वारा केसे करें अपनी सभी
परेशानियों का निदान.
जानिए की नारियल के प्रयोग द्वारा केसे करें अपनी
सभी परेशानियों का निदान
जेसा की आप सभी जानते हें की नारियल एक ऐसी
वस्तु है जो कि किसी भी सात्त्विक अनुष्ठान,
सात्त्विक पूजा, धार्मिक कृत्यों तथा हरेक मांगलिक
कार्यों के लिये सबसे अधिक महत्व
पूर्ण सामग्री है. इसकी कुछ विभिन्न विधियों
द्वारा हम अपने पारिवारिक, दाम्पत्य तथा आर्थिक
परेशानियों से निजात पा सकते हैं. ज्योतिषाचार्य
एवं वास्तु विशेषज्ञ पँ अभिषेक कुमार (ज्ञान जी) के अनुसार
—–घर में किसी भी प्रकार की आर्थिक समस्या हो
तो—-
एक नारियल पर चमेली का तेल मिले सिन्दूर से
स्वास्तिक का चिन्ह बनायें. कुछ भोग (लड्डू अथवा
गुड़ चना) के साथ हनुमान जी के मन्दिर में जाकर उनके
चरणों में अर्पित करके ऋणमोचक मंगल स्तोत्र का पाठ
करें. तत्काल लाभ प्राप्त होगा.
—यदि कुण्ड़ली में शनि, राहू, केतु की अशुभ दृष्टि,
इसकी अशुभ दशा , शनि की ढ़ैया या साढ़े साती चल
रही तो-
एक सूखे मेवे वाला नारियल लेकर उस पर मुँह के आकार
का एक कट करें. उसमें पाँच रुपये का मेवा और पाँच रुपये
की चीनी का बुरादा भर कर ढ़क्कन को बन्द कर दें.
पास ही किसी किसी पीपल के पेड़ के नीचे एक हाथ
या सवा हाथ गढ्ढ़ा खोदकर उसमें नारियल को
स्थापित कर दें. उसे मिट्टी से अच्छे से दबाकर घर चले
जायें. ध्यान रखें कि पीछे मुड़कर नही देखना. सभी
प्रकार के मानसिक तनाव से छुटकारा मिल जायेगा.
—-यदि आपके व्यापार में लगातार हानि हो रही हो,
घाटा रुकने का नाम नही ले रहा हो तो -
गुरुवार के दिन एक नारियल सवा मीटर पीले वस्त्र में
लपेटे. एक जोड़ा जनेऊ, सवा पाव मिष्ठान के साथ
आस-पास के किसी भी विष्णु मन्दिर में अपने संकल्प
के साथ चढ़ा दें. तत्काल ही लाभ प्राप्त होगा.
व्यापार चल निकलेगा.
यदि धन का संचय न हो पा रहा हो, परिवार
आर्थिक दशा को लेकर चिन्तित हो तो-
शुक्रवार के दिन माता लक्ष्मी के मन्दिर में एक
जटावाला नारियल, गुलाब, कमल पुष्प माला, सवा
मीटर गुलाबी, सफ़ेद कपड़ा, सवा पाव चमेली, दही,
सफ़ेद मिष्ठान एक जोड़ा जनेऊ के साथ माता को
अर्पित करें. माँ की कपूर व देसी घी से आरती उतारें
तथा श्रीकनकधारास्तोत्र का जाप करें. धन
सम्बन्धी समस्या तत्काल समाप्त हो जायेगी.
—–शनि, राहू या केतु जनित कोई समस्या हो, कोई
ऊपरी बाधा हो, बनता काम बिगड़ रहा हो, कोई
अनजाना भय आपको भयभीत कर रहा हो अथवा ऐसा
लग हो कि किसी ने आपके परिवार पर कुछ कर दिया
है तो इसके निवारण के लिये-
शनिवार के दिन एक जलदार जटावाला नारियल
लेकर उसे काले कपड़े में लपेटें. 100 ग्राम काले तिल,
100 ग्राम उड़द की दाल तथा एक कील के साथ उसे
बहते जल में प्रवाहित करें. ऐसा करना बहुत ही
लाभकारी होता है
.—–किसी भी प्रकार की बाधा, नजर दोष, किसी
भी प्रकार का भयंकर ज्वर, गम्भीर से गम्भीर रोगों
की समस्या विशेषकर रक्त सम्बन्धी हो तो-
शनिवार के दिन एक नारियल, लाल कपड़े में लपेटकर
उसे अपने ऊपर सात बार उवारें. किसी भी हनुमान
मन्दिर में ले जाकर उसे हनुमान जी के चरणों में अर्पित
कर दें. इस प्रयोग से तत्काल लाभ होगा.
—-यदि राहू की कोई समस्या हो, तनाव बहुत अधिक
रहता हो, क्रोध बहुत अधिक आ रहा हो, बनता काम
बिगड़ रहा हो, परेशानियों के कारण नींद न आ रही
हो तो-
बुधवार की रात्रि को एक नारियल को अपने पास
रखकर सोयें. अगले दिन अर्थात् वीरवार की सुबह वह
नारियल कुछ दक्षिणा के साथ गणेश जी के चरणों में
अर्पित कर दें. मन्दिर में यथासम्भव 11 या 21 लगाकर
दान कर कर दें. हर प्रकार का अमंगल, मंगल में बदल
जायेगा
.—–यदि आप किसी गम्भीर आपत्ति में घिर गये हैं.
आपको आगे बढ़ने का कोई रास्ता नही दिख रहा हो
तो -
दो नारियल, एक चुनरी, कपूर, गूलर के पुष्प की माला
से देवी दुर्गा का दुर्गा मंदिर में पूजन करें. एक नारियल
चुनरी में लपेट कर (यथासम्भव दक्षिणा के साथ) माता
के चरणों में अर्पित कर दें. माता की कपूर से आरती
करें. ‘हुं फ़ट्’ बोलकर दूसरा नारियल फ़ोड़कर माता
को बलि दें. सभी प्रकार के अनजाने भय तथा शत्रु
बाधा से तत्काल लाभ होगा.
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Saturday, September 30, 2017

*🌷कुण्डली में होरा का महत्व🌷*



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*वैदिक ज्योतिष में कई वर्ग कुण्डलियों का अध्ययन किया जाता है. कुण्डली का अध्ययन करते समय संबंधित भाव की वर्ग कुण्डली का अध्ययन अवश्य करना चाहिए. जिनमें से कुछ वर्ग कुण्डलियाँ प्रमुख रुप से उल्लेखनीय है.*

*होरा कुण्डली से जातक के पास धन-सम्पत्ति का आंकलन किया जाता है. इस कुण्डली को बनाने के लिए 30 अंश को दो बराबर भागों में बाँटते हैं जिसमें  15-15 अंश के दो भाग बनते हैं. कुण्डली को दो भागों में बाँटने पर ग्रह केवल सूर्य या चन्द्रमा की होरा में आती है. कुण्डली दो भागों, सूर्य तथा चन्द्रमा की होरा में बँट जाती है. समराशि में 0 से 15 अंश तक चन्द्रमा की होरा होगी. 15 से 30 अंश तक सूर्य की होरा होगी. विषम राशि में यह गणना बदल जाती है. 0 से 15 अंश तक सूर्य की होरा होगी. 15 से 30 अंश तक चन्द्रमा की होरा होती है.*

*उदाहरण के लिए माना मिथुन लग्न 22 अंश का हो तो यह विषम लग्न होगा है. विषम लग्न में लग्न की डिग्री 15 से अधिक है तब होरा कुण्डली में चन्द्रमा की होरा उदय होगी अर्थात होरा कुण्डली के प्रथम भाग में कर्क राशि आएगी और दूसरे भाग में सूर्य की राशि सिंह आएगी. अब ग्रहों को भी इसी प्रकार स्थापित किया जाएगा. माना बुध 17 अंश का मकर राशि में जन्म कुण्डली में स्थित है. मकर राशि समराशि है और बुध 17 अंश का है. समराशि में 15 से 30 अंश के मध्य ग्रह सूर्य की होरा में आते हैं तो बुध सूर्य की होरा में स्थित होंगे और सिंह राशि में बुध को लिखेंगे.*

*लग्न कुण्डली मुख्य कुण्डली होती है. लग्न कुण्डली में 12 भाव स्थिर होते हैं. इन बारह भावों के बारे में विस्तार से जानना है तो वर्ग कुण्डलियों का सूक्ष्मता से अध्ययन करना चाहिए. कई बार लग्न कुण्डली में घटना का होना स्पष्ट रुप से दिखाई देता है पर फिर भी जातक को समस्याओं का सामना करना पड़ता है. इसके लिए वर्ग कुण्डलियाँ देखना आवश्यक है. लग्न कुण्डली में कई बार ग्रह बली होते हैं और वही ग्रह वर्ग कुण्डली में निर्बल हो जाता है तब अनुकूल फल मिलने में बाधाओं का सामना करना पड़ता है.*

*अलग-अलग बातों के लिए अलग-अलग वर्ग कुण्डलियों का अध्ययन किया जाता है. लग्न कुण्डली के सप्तम भाव से जीवनसाथी का विचार किया जाता है. इसी सप्तम भाव के वर्ग कुण्डली में 12 हिस्से कर दिए जाते हैं तो वह नवाँश कुण्डली के नाम से जानी जाती है. नवाँश कुण्डली का अध्ययन जीवन के सभी पहलुओं के लिए किया जाता है.*

*सूर्य और चंद्र की होरा-:*

*एक बात का आपको विशेष रुप से ध्यान रखना होगा कि किसी भी वर्ग कुण्डली को बनाने के लिए गणना आपको जन्म कुण्डली में ही करनी होगी. अधिकतर स्थानों पर षोडशवर्ग कुण्डलियों का अध्ययन किया जाता है. लग्न कुण्डली है जो जीवन के सभी क्षेत्रों का अध्ययन किया जाता है. इस कुण्डली में 12 भाव तथा नौ ग्रहों का आंकलन किया जाता है. इसमें एक भाव 30 अंश का होता है. वर्ग कुण्डली में ग्रह किसी भी भाव या राशि में जाएँ लेकिन सभी वर्ग कुण्डलियों के लिए गणना जन्म कुण्डली में ही की जाएगी.*

*होरा कुण्डली से जातक की धन सम्पदा सुख सुविधा के विषय में विचार किया जाता है. संपति का विचार भी होरा लग्न से होता है, होरा लग्न या तो सूर्य का होता है या चन्द्रमा है यदि जातक सूर्य की होरा में उत्पन्न होता है तो वह पराक्रमी, स्वाभिमानी एवं बुद्धिमान दिखाई देता है. होरा में सूर्य के साथ यदि शुभ और अशुभ दोनों प्रकार के ग्रह हों तो जातक को जीवन के आरम्भिक समय में संघर्ष का सामना करना पड़ सकता है.*

*यदि सूर्य की होरा में पाप ग्रह हों तो जातक को परिवार एवं आर्थिक लाभ में कमी का सामना करना पड़ता है. कार्य क्षेत्र में भी अत्यधिक परिश्रम करना पड़ता है. यदि जातक चन्द्रमा की होरा में होता है तथा शुभ ग्रहों का साथ मिलने पर व्यक्ति को सम्पदा,वाहन एवं परिवार का सुख प्राप्त होता है. परंतु चंद्र की होरा में यदि पाप ग्रह हों तो मानसिक तनाव का दर्द सहना पड़ सकता है.*
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Tuesday, September 12, 2017

*🌷मंगल के बारह भाव का फल ओर उपाय🌷*



*किसी भी जातक के कुंडली के विभिन्न भावों में नौ ग्रहों की दशा उस जातक के जीवन पर कई प्रकार के प्रभाव डालती है. भावों में जिस प्रकार चंद्रमा की दशा जातक के जीवन को प्रभावित करती है, उसी प्रकार मंगल की दशा भी जातक के स्वभाव का वर्णन करती है. कुंडली के 12 भावों में मंगल की दशा से पता लगता है कि जातक का स्वभाव कैसा होगा और जातक के जीवन में इसका क्या अनुकूल या प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है. ज्योतिष शास्त्र में इन भावों में मंगल की दशा से उत्पन्न विसंगतियों को दूर करने के कुछ सरल उपाय बताए गये हैं. इन उपायों को अपनाकर जातक मंगल के दोष को दूर कर सकता है और जीवन में उत्पन्न परेशानियों को सरल बना सकता है. आइए जानते हैं 12 भावों में मंगल का प्रभाव और दोष निवारण....*

*पहले भाव में मंगल*

*कुण्डली के प्रथम भाव में अर्थात पहले खाने में मंगल बैठा हो तो जातक झूठा और मक्कार होता है. भाइयों का अनिष्टकारक होता है. इस भाव में मंगल होने से जातक की पत्नी की मृत्यु अग्नि दुर्घटना में होती है. दो विवाह का योग बनता है. जातक की पत्नी रोगग्रस्त होती है. जातक झगड़ालू और लड़ाकू होता है. अगर पहले भाव में मंगल और बारहवें भाव में चन्द्र हो तो जातक दरिद्र होता है.*

*उपाय और टोटके-:*
*1. मंगल को शुभ बनाने के लिए हनुमान चालीसा का प्रतिदिन पाठ करें.*
*2. मिट्टी के घड़े में गुड़ डालकर मंगलवार को सुनसान स्थान में रख आएं.*
*3. लाल रंग के वस्त्रों का ज्यादा उपयोग करें.*
*4. मंगलवार का व्रत रखें.*
*5. सिद्ध मंगल यंत्र धारण करें.*

*दूसरे भाव में मंगल*

*कुण्डली के दूसरे खाने में मंगल बैठा हो तो जातक 9 वर्षों तक रोग से पीड़ित रहता है. यदि जातक अपने भाइयों से छोटा है तो बड़े भाई की मृत्यु का योग बनता है. विवाहित जीवन में पति-पत्नी में आपसी क्लेश बना रहेगा. मंगल अशुभ हो तो जातक की मृत्यु लड़ाई-झगड़े में होने की आशंका रहती है.*

*उपाय और टोटके-:*
*1. दोपहर के समय बच्चों को फल बांटें.*
*2. मंगलवार का व्रत रखें.*
*3. लाल रूमाल सदैव अपने पास रखें.*
*4. सवा किलो या सवा पांच किलो रेवड़ियां बहते जल में प्रवाहित करें.*
*5. पांच छुहारे जल में उबालकर नदी में प्रवाहित करें.*

*तीसरे भाव में मंगल*

*कुण्डली में तीसरे खाने में मंगल बैठा हो तो जातक शराबी होता है. जातक चालबाज एवं धोखेबाज होता है. मंगल के अशुभ प्रभाव से जातक ब्लड प्रेशर का रोगी हो सकता है. मंगल अशुभ होकर जातक की हत्या भी करवा सकता है. मंगल की अशुभता के कारण जातक अपना काम स्वयं बिगाड़ लेता है.*

*उपाय एवं टोटके-:*
*1. चापलूस मित्रों से दूर रहें.*
*2. साढ़े पांच रत्ती मूंगा (रत्न) सोने की अंगूठी में जड़वाकर मंगलवार के दिन धारण करें.*
*3. मूंगा धारण करने की शक्ति (क्षमता) न हो तो 'सिद्ध मंगल यंत्र' धारण करें.*
*4. हाथी दांत से बनी वस्तुएं घर में न रखें.*
*5. चांदी की अंगूठी बाएं हाथ की उंगली में धारण करें.*

*चौथे भाव में मंगल*

*कुण्डली में चौथे खाने में मंगल बैठा हो तो जातक मांगलिक होता है. जातक संतानहीन हो सकता है. जातक रोग से पीड़ित रहता है. क्रोध के कारण स्वयं की हानि होती है. विवाह में समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं. जातक वृद्धावस्था में अंधा हो सकता है. मंगल चौथे खाने में हो और बुध 12वें हो तो जातक पूर्ण रूप से दरिद्र होता है.*

*उपाय एवं टोटके-:*
*1. त्रिधातु की अंगूठी धारण करें.*
*2. 'सिद्ध मंगल यंत्र' गले में अथवा दाहिने बाजू पर धारण करें. सिद्ध किया हुआ मंगल यंत्र शीघ्र शुभ फल प्रदान करता है.*
*3. देवताओं की मूर्तियां घर में स्थापित न करें.*
*4. अपने बिस्तर, तकिया आदि पर लाल रंग का कवर चढ़ाएं.*

*पांचवें भाव में मंगल*

*कुण्डली के पांचवें खाने (भाव) में मंगल बैठा हो तो जातक (जिसकी जन्म कुण्डली हो), पाप कर्म में लिप्त शराबी हो सकता है. जीवन में अनेक परेशानियां आएंगी. मिरगी का रोगी भी हो सकता है. जातक नेत्र रोगी भी हो सकता है. जातक की स्त्री गर्भस्राव रोग से परेशान हो सकती है.*

*उपाय एवं टोटके-:*
*1. रात को सिरहाने तांबे के लोटे में पानी भरकर रखें और सुबह उठकर उस जल को पीपल के वृक्ष की जड़ में डाल दें.*
*2. आंगन में नीम का पेड़ लगाएं.*
*3. 'सिद्ध मंगल यंत्र' गले में धारण करें या सवा पांच रत्ती मूंगा की अंगूठी बनवाकर दाहिने हाथ की उंगली में मंगलवार के दिन धारण करें.*
*4. मंगलवार का व्रत रखें.*
*5. मंगलवार को हनुमान मंदिर में जाकर हनुमान चालीसा बांटें.*
*6. वैदिक विधि से 'मंगल शांति पाठ' कराएं.*

*छठे भाव में मंगल*

*जिसकी कुण्डली में मंगल छठे भाव में होता है वैसा जातक बवासीर या ब्लडप्रेशर का रोगी हो सकता है. जातक कामुक स्वभाव होता है और पराई स्त्रियों पर बुरी नीयत रखता है. मंगल छठे भाव में हो और बुध आठवें भाव हो तो जातक की छोटी उम्र में ही उसकी माता का देहान्त हो जाने की आशंका रहती है. मंगल छठे और बुध 12वें भाव में हो तो जातक के भाई-बहनों की स्थिति दयनीय होती है.*

*उपाय एवं टोटके-:*
*1. चार सूखे खड़कते नारियल मंगलवार के दिन नदी में प्रवाहित करें.*
*2. मंगलवार के दिन हनुमानजी को सिंदूर चढ़ाएं और पीले लड्डू का प्रसाद चढ़ाकर लोगों को बांटें.*
*3. 'सिद्ध मंगल यंत्र' धारण करने से अशुभता का नाश होगा और शुभ फल मिलेगा.*
*4. हनुमान चालीसा या हनुमान स्तुति बांटें.*
*5. कुंवारी कन्याओं का पूजन करें.*

*सातवें भाव में मंगल*

*कुण्डली के सातवें घर (भाव) में मंगल बैठा हो तो जातक की स्त्री क्रोधी स्वभाव की होगी. जातक स्वयं क्रोध के कारण अपना नुकसान कर लेता है. जातक प्राय: पुत्रहीन होता है. ऐसे जातकों की पराई स्त्री से संबंध होते हैं.*

*उपाय एवं टोटके-:*
*1. चांदी की ठोस गोली बनवाकर सदैव अपनी जेब में रखें.*
*2. मंगलवार के दिन लस्सी जरूर पियें.*
*3. लाल रूमाल अपनी जेब में रखें.*
*4. बहन को मंगलवार के दिन अपने हाथ से मिठाई खिलाएं.*
*5. 'सिद्ध मंगल यंत्र' धारण करें.*
*6. हनुमानजी का व्रत रखें, हनुमान चालीसा बांटें.*

*आठवें भाव में मंगल*

*कुण्डली में आठवें भाव (घर) में मंगल बैठा हो तो मंगल के अशुभ प्रभाव से जातक अल्प आयु वाला तथा दरिद्र होता है. जातक के लिए 28 वर्षों तक मौत का फंदा बना रहता है. मंगल आठवें भाव में हो और बुध छठे भाव में हो तो जातक की माता की मृत्यु जातक के बचपन में हो जाने की आशंका रहती है. जातक 'मर्डर केस' में फंस सकता है. जातक रोगी होता है.*

*उपाय एवं टोटके-:*
*1. विधवा स्त्री की सेवा करें.*
*2. चांदी की चेन धारण करें.*
*3. 'सिद्ध मंगल यंत्र' जरूर धारण करें.*
*4. त्रिधातु की अंगूठी धारण करें.*
*5. हनुमान चालीसा का प्रतिदिन पाठ करें और मंगलवार के दिन हनुमान चालीसा हनुमानजी के मंदिर में जाकर बांटें.*
*6. लाल रूमाल सदैव अपने पास रखें.*

*नौवें भाव में मंगल*

*कुण्डली में नवम् भाव में मंगल हो तो जातक क्रोधी स्वभाव का होता है. विद्या अधूरी रह जाती है. जातक झूठा होता है. ईमानदार हो फिर भी बदनामी मिलती है. जीवन के क्षेत्र में सफलता कम मिलती है. ऐसा जाकत स्त्री की कमाई पर जीवन-यापन करता है.*

*उपाय एवं टोटका-:*
*1. मंगलवार को 21, 51 या 101 हनुमान चालीसा बांटें.*
*2. मंगलवार को हनुमानजी को सिंदूर एवं लड्डू चढ़ाएं.*
*3. 'सिद्ध मंगल यंत्र' धारण करें.*
*4. तांबे के सात चौकोर टुकड़े बनाकर मिट्टी के नीचे दबा दें.*
*5. प्रतिदिन 'हनुमान स्तुति' का पाठ करें.*

*दसवें भाव में मंगल*

*दसवें खाने में अगर मंगल बैठा हो तो जातक को चोरी के आरोप में जेल जाना पड़ सकता है. मंगल दसवें, सूर्य चौथे, बुध छठे खाने में हो तो जातक एक आंख का काना हो सकता है. मंगल के साथ कोई पापी ग्रह हो तो जातक बर्बाद हो जाता है. मंगल के अशुभ प्रभाव से जातक 15 वर्ष तक बीमारी से पीड़ित हो सकता है.*

*उपाय एवं टोटका-:*
*1. संतानहीन की सेवा करें.*
*2. घर में हिरण पालें.*
*3. मंगलवार को मीठा भोजन करें.*
*4. हनुमानजी को लड्डू चढ़ाएं.*
*5. मंगलवार को हनुमान चालीसा बांटें.*

*ग्यारहवें भाव में मंगल*

*मंगल ग्यारहवें भाव में हो तो जातक कर्जदार रहता है. जातक की संतान झगड़ालू होती है. जातक को मित्रों से धोखे मिलते हैं. शिक्षा में विघ्न बाधाएं उत्पन्न होती हैं. आजीविका के लिए कठोर संघर्ष करना पड़ सकता है.*

*उपाय एवं टोटका-:*
*1. बिना जोड़ वाला सोने का छल्ला धारण करें.*
*2. काला कुत्ता पालें.*
*3. केसर का तिलक लगाएं.*
*4. कर्ज से मुक्ति के लिए प्रभावकारी 'सिद्ध मंगल यंत्र' धारण करें.*
*5. मंगल व्रत रखें और पीले लड्डू का प्रसाद बांटें.*

*बारहवें भाव में मंगल*

*कुण्डली में बारहवें भाव में अगर मंगल हो तो जातक को शत्रुओं से हानि की आशंका रहती है. लाभ से अधिक व्यय होगा. घर में चोरी होने का भय बना रहता है. पत्नी से अनबन की संभावना प्रबल रहती है. जातक संतानहीन हो सकता है.*

*उपाय एवं टोटका-:*
*1. चांदी की चेन धारण करें.*
*2. लाल रूमाल सदैव अपने पास रखें.*
*3. एक किलो पतासे मंगल के दिन बहते जल में प्रवाहित करें.*
*4. 'सिद्ध मंगल यंत्र' धारण करने से शुभ लाभ होगा.*
*5. तंदूर में मीठी रोटी सेंककर कुत्ते को खिलाएं.*
*6. साढ़े पांच रत्ती मूंगा सोने की अंगूठी में जड़वाकर धारण करें।*
*👉अधिक जानकारी प्राप्त करने के लिये व्हाट्सअप करें=========================
9472998128

Sunday, September 3, 2017

शनि देव की कृपादृष्टि से करें धनार्जन

उड़द का ये उपाय करेंगे तो शनि कृपा से बढ़ सकती है
कमाई:
---------------------------------------------
----------------
यदि आपकी कुंडली में शनि या राहु-केतु
से संबंधित कोई दोष है तो यहां कुछ उपाय बताए जा रहे हैं। ये
उपाय उड़द की दाल से किए जाने हैं।
शनि का सीधा असर सभी 12 राशियों पर
होता है। ज्योतिष के अनुसार शनि को न्यायाधीश
का पद प्राप्त है। वर्तमान में तीन राशियों (कन्या,
तुला और वृश्चिक) पर
शनि की साढ़ेसाती और दो राशियों (कर्क
और मीन) पर शनि की ढय्या चल
रही है। इस प्रकार इन पांच राशियों पर
शनि का सर्वाधिक असर बना हुआ है। यदि आप
भी शनि की कृपा से धन
संबंधी परेशानियों से मुक्ति चाहते हैं तो यहां दिए
जा रहे उपाय समय-समय पर करते रहें...
--------धन लाभ की कामना करते हुए यह
उपाय समय-समय पर करें.--------
किसी भी शनिवार की शाम
को खड़ी उड़द के एक दाने पर
थोड़ा सा दही और सिंदूर लगाएं और उसे
किसी भी पीपल के
नीचे रख आएं। वापस आते समय पीछे
मुड़कर नहीं देखें। यह उपाय शनिवार से
ही शुरू करना चाहिए। हर शनिवार यह उपाय करते
रहें। निकट भविष्य में शनि कृपा से धन
संबंधी कार्यों में लाभ मिल सकते हैं
सुख-शांति के लिए ये उपाय करें
घर में सुख-शांति नहीं रहती हो और
हमेशा वाद-विवाद होते रहते हों तो ये उपाय करें। उपाय के
अनुसार शनिवार को किसी पीपल के
नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाएं और
उसमें काले उड़द के तीन दाने डाल दें। यह उपाय
हर शनिवार करें तो घर में वाद-विवाद कम हो सकते हैं।
महीने में कम से कम दो बार करें ये उपाय
घर में एक कंडा (उपले) जलाएं और इसके ऊपर लोबान, गूगल
की धुनी दें। इसका धुआं पूरे घर में
फैला दें। ऐसा करने पर वातावरण में फैले हुए
सभी हानिकारक सुक्ष्म कीटाणु नष्ट
हो जाएंगे। घर की नकारात्मक ऊर्जा खत्म
होगी और सकारात्मक ऊर्जा बढ़ेगी।
किसी पीपल पर लगाएं सफेद झंडा
यदि आप शनि दोषों की कारण परेशानियों का सामना कर
रहे हैं तो शनिवार के दिन किसी पीपल
पर सफेद कपड़े का झंडा लगाएं। यह उपाय धन
संबंधी कार्यों में शुभ फल प्रदान कर सकता है।
शनिवार को ऐसे करें तेल का दान
शनिवार के शनि को मनाने का सबसे अच्छा उपाय है तेल का दान
करना। इस उपाय के लिए एक कटोरी में तेल लें और
उसमें अपना चेहरा देखें, इसके बाद इस तेल का दान कर दें। यह
पारंपरिक उपाय सर्वाधिक प्रचलित है। सामान्यत: यह उपाय
अधिकांश लोगों द्वारा किया जाता है।
तेल के दीपक और उड़द का उपाय
हनुमानजी के भक्तों को शनिदेव से
किसी प्रकार का कोई भय
नहीं रहता है। यदि आप शनि के बुरे प्रभावों से
जल्द मुक्ति पाना चाहते हैं तो शनिवार के दिन से प्रतिदिन
किसी भी हनुमान मंदिर में जाएं।
हनुमानजी के सामने तेल का दीपक
लगाएं और दीपक में खड़ी उड़द के 5
दाने डालें। शनिवार से यह उपाय प्रारंभ करें। इसके बाद उपाय
प्रतिदिन करना चाहिए।
यदि आप प्रतिदिन नहीं कर सकते हैं तो कम से
कम हर शनिवार को अवश्य करें। इससे बहुत
ही जल्द आपकी कई समस्याओं
का नाश हो सकता है। ध्यान रहे, इस उपाय के साथ
ही आपको अपनी ओर से प्रयास करने
होंगे। हनुमानजी की उपासना करने वाले
भक्तों को सभी प्रकार के अधार्मिक कृत्यों से
बचना चाहिए।
तेल के दीपक और उड़द का उपाय
हनुमानजी के भक्तों को शनिदेव से
किसी प्रकार का कोई भय
नहीं रहता है। यदि आप शनि के बुरे प्रभावों से
जल्द मुक्ति पाना चाहते हैं तो शनिवार के दिन से प्रतिदिन
किसी भी हनुमान मंदिर में जाएं।
हनुमानजी के सामने तेल का दीपक
लगाएं और दीपक में खड़ी उड़द के 5
दाने डालें। शनिवार से यह उपाय प्रारंभ करें। इसके बाद उपाय
प्रतिदिन करना चाहिए।
यदि आप प्रतिदिन नहीं कर सकते हैं तो कम से
कम हर शनिवार को अवश्य करें। इससे बहुत
ही जल्द आपकी कई समस्याओं
का नाश हो सकता है। ध्यान रहे, इस उपाय के साथ
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होंगे। हनुमानजी की उपासना करने वाले
भक्तों को सभी प्रकार के अधार्मिक कृत्यों से
बचना चाहिए।
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Saturday, September 2, 2017

::: बगलामुखी शाबर मंत्र साधना :::


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माता बगलामुखी के कई शाबर मंत्र मिलते है | ये मंत्र रक्षा कारक, विरोधियो का स्तम्भन , ग्रह बाधा स्तम्भन , वशीकरण आदि प्रयोजन के लिए उत्तम है | शाबर मंत्र की शक्ति गुरु कृपा और व्यक्ति के आत्मबल के साथ उसकी आतंरिक उर्जा से चलती है | मंत्र की शक्ति पूर्व संस्कार और कर्मो पर भी निर्भर करती है | शाबर मंत्र स्वयम सिद्ध होते हैं और इनमें ध्यान प्रधान है | आप जितने गहरे ध्यान में जाकर जप करेगे उतनी शक्ति का प्रवाह होगा | शाबर मंत्र की सिद्धि की कुछ निशानी होती है जैसे जप के दौरान आँखों से पानी आना, निरंतर उबासी आना, सर भरी पड़ना और बहुत सी निशानी हैं जो ज्यादातर लोग जानते नहीं हैं और लम्बे चोडे विधान देते हैं | शाबर मंत्र के लिए यह कहा गया है की १००० जाप पे सिद्धि , ५००० जाप पे उत्तम सिद्धि और १०००० जाप पे महासिद्धि |

मंत्र : ॐ मलयाचल बगला भगवती माहाक्रूरी माहाकराली
राज मुख बन्धनं , ग्राम मुख बन्धनं , ग्राम पुरुष बन्धनं ,
काल मुख बन्धनं , चौर मुख बन्धनं , व्याघ्र मुख बन्धनं ,
सर्व दुष्ट ग्रह बन्धनं , सर्व जन बन्धनं , वशिकुरु हूँ फट स्वाहा ||

विधान :
======
इस मंत्र का जप माता बगला के सामान्य नियमो का पालन करते हुए किसी शुभ मुहूर्त से शुरू कर विधि विधान सहित १० माला प्रतिदिन करें ११ दिनों तक और दशान्श हवन करें और नित्य १ माला जप करते रहें मंत्र जागृत रहेगा | किसी भी प्रयोग को करने के लिए संकल्प लें , कम से कम ५ माला जप करें और हवन कर दें प्रयोग सिद्ध होगा | रक्षा के लिए ७ बार मंत्र पढ़ के छाती पे और दसो दीशाओ मैं फुक मार दें , किसी भी चीज़ का भय नहीं रहेगा | नियमित जाप से मंत्र मैं लिखे सभी कार्य स्वयम सिद्ध होते हैं अलग से प्रयोग की आवश्यकता नहीं है | मंत्र को ग्रहण , दिवाली आदी पर्व में जप कर पूर्णता जागृत रखें | नज़र दोष के लिए मंत्र को पढ़ते हुए मोर पंख से झाडे |पीला नेवेद्य माता को अर्पित करे | ध्यान मग्न होकर जप करने से जल्दी सिद्ध होता है |मंत्र सिद्धि के पूर्व किसी बगला साधक से संपर्क कर उनसे मंत्र ग्रहण करें और विधि-विधान समझ लें |..................................................................
अधिक जानकारी के लिए सम्पर्क करें,,
9472998128

Friday, September 1, 2017

वास्तु दोष -के निवारण जाने,,,, कैसे करते हैं।



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घरों में तस्वीर या चित्र लगाने से घर सुंदर दिखता है, परंतु
बहुत कम ही लोग यह जानते हैं कि घर में लगाए गए
चित्र का प्रभाव वहां रहने वाले लोगों के जीवन पर
भी पड़ता है। वास्तु शास्त्र के अनुसार घर में श्रृंगार,
हास्य व शांत रस उत्पन्न करने
वाली तस्वीरें ही लगाई
जानी चाहिए।
घर के अन्दर और बाहर सुन्दर चित्र , पेंटिंग , बेल- बूटे ,
नक्काशी लगाने से ना सिर्फ
सुन्दरता बढती है , वास्तु दोष भी दूर होते
है।
1- फल-फूल व हंसते हुए
बच्चों की तस्वीरें जीवन
शक्ति का प्रतीक है। उन्हें पूर्वी व
उत्तरी दीवारों पर लगाना शुभ होता है। इनसे
जीवन में खुशहाली आती है।
2- लक्ष्मी व कुबेर की तस्वीरें
भी उत्तर दिशा में लगानी चाहिए। ऐसा करने
से धन लाभ होने की संभावना अधिक
होती है।
3- यदि आप पर्वत आदि प्राकृतिक
दृश्यों की तस्वीरें लगाना चाहते हैं
तो दक्षिण या पश्चिम दिशा में लगाएं।
4- नदियों-झरनों आदि की तस्वीरें
उत्तरी व पूर्वी दिशा में लगाना शुभ होता है।
5- वसुदेव द्वारा बाढग़्रस्त यमुना से श्रीकृष्ण
को टोकरी में ले जाने वाली तस्वीर
समस्याओं से उबरने की प्रेरणा देती है। इसे
हॉल में लगाना चाहिए।
युद्ध प्रसंग, रामायण या महाभारत के युद्ध के चित्र, क्रोध, वैराग्य,
डरावना, वीभत्स, दुख की भावना वाला, करुण
रस से ओतप्रोत स्त्री, रोता बच्चा, अकाल, सूखे पेड़ कोई
भी चित्र घर में न लगायें।
घर में दक्षिण दीवार पर हनुमान जी का लाल
रंग का चित्र लगाएं। ऐसा करने से अगर मंगल आपका अशुभ है
तो वो शुभ परिणाम देने लगेगा। हनुमान
जी का आशीर्वाद आपको मिलने लगेगा। साथ
ही पूरे परिवार का स्वास्थय अच्छा रहेगा।
घर का उत्तर पूर्व कोना (इशान कोण) स्वच्छ रखें व वंहा बहते
पानी का चित्र लगायें | (ध्यान रहे इस चित्र में पहाड़/
पर्वत न हो )
अपनी तस्वीर उत्तर या पूर्व दिशा मैं लगायें
उत्तर क्षेत्र की दीवार पर
हरियाली या हरे चहकते हुए पक्षियों (तोते
की तस्वीर) का शुभ चित्र लगाएं। ऐसा करने
से परिवार के लोगों की एकाग्रता बनेगी साथ
ही बुध ग्रह के शुभ परिणाम मिलेंगे। उत्तर दिशा बुध
की होती है।
लक्ष्मी व कुबेर की तस्वीरें
भी उत्तर दिशा में लगानी चाहिए। ऐसा करने
से धन लाभ होने की संभावना है।
घर में जुडवां बत्तख व हंस के चित्र लगाना लगाना श्रेष्ठ रहता है।
ऐसा करने से समृद्धि आती है।
घर की तिजोरी के पल्ले पर
बैठी हुई
लक्ष्मीजी की तस्वीर
जिसमें दो हाथी सूंड उठाए नजर आते हैं, लगाना बड़ा शुभ
होता है। तिजोरी वाले कमरे का रंग क्रीम
या ऑफ व्हाइट रखना चाहिए।
घर में नाचते हुए गणेश की तस्वीर
लगाना अति शुभ होता है।
बच्चाा जिस तरफ मुंह करके पढता हो, उस दीवार पर
मां सरस्वती का चित्र लगाएं। पढाई में रूचि जागृत
होगी।
बच्चों के उत्तर-पूर्व दीवार में लाल पट्टी के
चायनीज बच्चों की युगल फोटों लगाएं।
ऎसा करने से घर में खुशियां आएंगी और आपके
बच्चो का करियर अच्छा बनेगा। इन उपायों को अपनाकर आप अपने
बच्चे को एक अच्छा करियर दे सकते हैं और जीवन में
सफल बना सकते हैं।
अध्ययन कक्ष में मोर, वीणा, पुस्तक, कलम, हंस,
मछली आदि के चित्र लगाने चाहिए।
बच्चों के शयन कक्ष में हरे फलदार वृक्षों के चित्र, आकाश, बादल,
चंद्रमा अदि तथा समुद्र तल की शुभ आकृति वाले चित्र
लगाने चाहिए।
फल-फूल व हंसते हुए बच्चों की तस्वीरें
जीवन शक्ति का प्रतीक है। उन्हें
पूर्वी व उत्तरी दीवारों पर लगाएं।
ऐसे नवदम्पत्ति जो संतान सुख पाना चाहते हैं वे
श्रीकृष्ण का बाल रूप दर्शाने
वाली तस्वीर अपने बेडरूम में लगाएं।
यदि आप अपने वैवाहिक रिश्ते को अधिक मजबुत और प्रसन्नता से
भरपूर बनाना चाहते हैं तो अपने बेडरुम में नाचते हुए मोर का चित्र
लगाएं।
यूं तो पति-पत्नी के कमरे में पूजा स्थल
बनवाना या देवी-देवताओं
की तस्वीर लगाना वास्तुशास्त्र में निषिद्ध है
फिर भी राधा-कृष्ण
अथवा रासलीला की तस्वीर
बेडरूम में लगा सकते हैं। इसके साथ
ही बांसुरी, शंख, हिमालय आदि के चित्र
दाम्पत्य सुख में वृद्धि के कारक होते हैं।
कैरियर में सफलता प्राप्ति के लिए उत्तर दिशा में जंपिंग फिश, डॉल्फिन
या मछालियों के जोड़े का प्रतीक चिन्ह लगाए जाने चाहिए।
इससे न केवल बेहतर कैरियर
की ही प्राप्ति होती है
बल्कि व्यक्ति की बौद्धिक
क्षमता भी बढ़ती है।
अपने शयन कक्ष
की पूर्वी दीवार पर उदय होते
हुए सूर्य की ओर पंक्तिबद्ध उड़ते हुए शुभ उर्जा वाले
पक्षियों के चित्र लगाएं। निराश, आलस से परिपूर्ण, अकर्मण्य,
आत्मविश्वास में कमी अनुभव करने वाले व्यक्तियों के लिए
यह विशेष प्रभावशाली है।
अगर किसी का मन बहुत ज्यादा अशांत रहता है
तो अपने घर के उत्तर-पूर्व में ऐसे बगुले का चित्र लगाना चाहिए
जो ध्यान मुद्रा मैं हो।
स्वर्गीय परिजनों के चित्र दक्षिण
की दीवार पर लगाने से सुख
समृधि बढेगी
यदि ईशान कोण में शौचालय हो, तो उसके बाहर शिकार करते हुए शेर
का चित्र लगाएं।
अग्नि कोण में रसोई घर नहीं हो, तो उस कोण में यज्ञ
करते हुए ऋषि-विप्रजन
की चित्राकृति लगानी चाहिए।
रसोई घर में माँ अन्नपूर्णा का चित्र शुभ माना जाता है।
रसोई घर आग्नेय कोण में नहीं है
तो ऋषि मुनियों की तस्वीर लगाए।
मुख्य द्वार यदि वास्तु अनुरूप ना हो तो उस पर
नक्काशी , बेल बूटे बनवाएं।
दाम्पत्य जीवन को सुखमय बनाने के लिए घर में राधा कृष्ण
की तस्वीर लगाएं।
पढने के कमरे में माँ सरस्वती , हंस ,
वीणा या महापुरुषों की तस्वीर
लगाएं।
व्यापर में सफलता पाने के लिए कारोबार स्थल पर सफल और
नामी व्यापारियों के चित्र लगाएं।
ईशान कोण में शौचालय होने पर उसके बाहर शेर का चित्र लगाएं।
पूर्वजों की तस्वीर देवी देवताओं
के साथ ना लगाएं।उनकी तस्वीर का मुंह
दक्षिण की ओर होना चाहिए।
दक्षिण मुखी भवन के द्वार पर नौ सोने
या पीतल के नवग्रह यंत्र लगाए और
हल्दी से स्वस्तिक बनाए।
सोने का कमरा आग्नेय कोण में
हो तो पूर्वी दीवार के मध्य में समुद्र
का चित्र लगाए।

जय श्री नारायण
  अधिक जानकारी के लिए आप हमसे कॉन्टेक्ट करसकते है,,,, 
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Wednesday, August 30, 2017

धन के लिए ये उपाय आजमाने चाहिए।*

*गुरुवार को धन की बरकत के लिए उपाय --अगर आप आर्थिक रुप से परेशान रहते हैं, अनावश्यक व्यय के कारण हर महीने आपका बजट बिगड़ रहा है तो गुरुवार के दिन धन के लिए ये उपाय आजमाने चाहिए।*

💥💥💥💥💥💥💥💥💥💥💥💥💥💥💥💥💥💥💥💥💥💥💥💥💥💥💥💥💥💥💥💥💥💥💥💥

*ज्योतिषशास्त्र में बताया गया है कि गुरु धन का कारक ग्रह है। जिस व्यक्ति पर गुरु की कृपा होती है उसकी आर्थिक स्थिति अच्छी रहती है--*

*1.गुरुवार के दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान ध्यान करें और घी का दीप जलाकर भगवान विष्णु की पूजा करें। इसके बाद विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।*

*2.शाम के समय केले के वृक्ष के नीचे दीपक जलाकर लड्डू या बेसन की मिठाई अर्पित करें और लोगों में बांट दें।*

*3.गुरुवार के दिन भगवान की पूजा के बाद केसर का तिलक लगाएं। अगर केसर उपलब्ध नहीं हो तब हल्दी का तिलक भी लगा सकते हैं।*

*4.गुरु का प्रभाव धन पर होता है। अगर कोई गुरुवार के दिन आपसे धन मांगने आता है तो लेन देने से बचें। गुरुवार को धन देने से आपका गुरु कमजोर हो जाता है, इससे आर्थिक परेशानी बढ़ती है।*

*5. रोज नही तो कम से कम गुरुवार के दिन माता पिता एवं गुरु का आशीर्वाद लें। इनका आशीर्वाद गुरु ग्रह का आशीर्वाद माना जाता है। इनकी प्रसन्नता के लिए पीले रंग के वस्त्र उपहार स्वरुप दें।*

*6.संध्या के समय गुरुवार के दिन लोबान की धूनी घर – व्यापार में देने से धन की आवक बढ़ती है ।*

*7.यदि शुक्ल पक्ष के प्रथम गुरुवार से तीन गुरुवार तक गरीबों में मीठे तथा पीले चावल बांटे जाए तो शीघ्र ही धन लाभ होने लगेगा ।*

*8.यदि आपके आर्थिक कार्य सिद्ध होते – होते रुक जाते हों तो पीले सूत के धागे में सफ़ेद चन्दन के 1 टुकड़े को बांधकर किसी केले के पेड़ पर लटका आएं । शीघ्र ही इसका प्रभाव देखने को मिल जाएगा ।*
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Sunday, August 27, 2017

✡️ Third Eye - आज्ञा✡️



🌘आज्ञा चक्र मस्तक के मध्य में, भौंहों के बीच स्थित है। इस कारण इसे "तीसरा नेत्र” भी कहते हैं। आज्ञा चक्र स्पष्टता और बुद्धि का केन्द्र है। यह मानव और दैवी चेतना के मध्य सीमा निर्धारित करता है।

🌘यह ३ प्रमुख नाडिय़ों, इडा (चंद्र नाड़ी) पिंगला (सूर्य नाड़ी) और सुषुम्ना (केन्द्रीय, मध्य नाड़ी) के मिलने का स्थान है। जब इन तीनों नाडिय़ों की ऊर्जा यहां मिलती है और आगे उठती है, तब हमें समाधि, सर्वोच्च चेतना प्राप्त होती है।

🌘इसका मंत्र है ॐ। आज्ञा चक्र का रंग सफेद है। इसका तत्व मन का तत्व, अनुपद तत्त्व है। इसका चिह्न एक श्वेत शिवलिंगम्, सृजनात्मक चेतना का प्रतीक है। इसमें और बाद के सभी चक्रों में कोई पशु चिह्न नहीं है। इस स्तर पर केवल शुद्ध मानव और दैवी गुण होते हैं।

🌘आज्ञा चक्र के प्रतीक चित्र में दो पंखुडिय़ों वाला एक कमल है जो इस बात का द्योतक है कि चेतना के इस स्तर पर 'केवल दो', आत्मा और परमात्मा (स्व और ईश्वर) ही हैं। आज्ञा चक्र की देव मूर्तियों में शिव और शक्ति एक ही रूप में संयुक्त हैं। इसका अर्थ है कि आज्ञा चक्र में चेतना और प्रकृति पहले ही संयुक्त है, किन्तु अभी भी वे पूर्ण ऐक्य में समाए नहीं हैं।

🌘इस चक्र के गुण हैं - एकता, शून्य, सत, चित्त और आनंद।

🌘 'ज्ञान नेत्र' भीतर खुलता है और हम आत्मा की वास्तविकता देखते हैं - इसलिए 'तीसरा नेत्र' का प्रयोग किया गया है जो भगवान शिव का द्योतक है। आज्ञा चक्र 'आंतरिक गुरू' की पीठ (स्थान) है। यह द्योतक है बुद्धि और ज्ञान का, जो सभी कार्यों में अनुभव किया जा सकता है। उच्चतर, नैतिक विवेक के तर्कयुक्त शक्ति के समक्ष अहंकार आधारित प्रतिभा समर्पण कर चुकी है। तथापि, इस चक्र में एक रुकावट का उल्टा प्रभाव है जो व्यक्ति की परिकल्पना और विवेक की शक्ति को कम करता है, जिसका परिणाम भ्रम होता है।
🌘🕉️🕉️🕉️🌒 चक्र ✡️

🌘आज्ञा चक्र मस्तक के मध्य में, भौंहों के बीच स्थित है। इस कारण इसे "तीसरा नेत्र” भी कहते हैं। आज्ञा चक्र स्पष्टता और बुद्धि का केन्द्र है। यह मानव और दैवी चेतना के मध्य सीमा निर्धारित करता है।

🌘यह ३ प्रमुख नाडिय़ों, इडा (चंद्र नाड़ी) पिंगला (सूर्य नाड़ी) और सुषुम्ना (केन्द्रीय, मध्य नाड़ी) के मिलने का स्थान है। जब इन तीनों नाडिय़ों की ऊर्जा यहां मिलती है और आगे उठती है, तब हमें समाधि, सर्वोच्च चेतना प्राप्त होती है।

🌘इसका मंत्र है ॐ। आज्ञा चक्र का रंग सफेद है। इसका तत्व मन का तत्व, अनुपद तत्त्व है। इसका चिह्न एक श्वेत शिवलिंगम्, सृजनात्मक चेतना का प्रतीक है। इसमें और बाद के सभी चक्रों में कोई पशु चिह्न नहीं है। इस स्तर पर केवल शुद्ध मानव और दैवी गुण होते हैं।

🌘आज्ञा चक्र के प्रतीक चित्र में दो पंखुडिय़ों वाला एक कमल है जो इस बात का द्योतक है कि चेतना के इस स्तर पर 'केवल दो', आत्मा और परमात्मा (स्व और ईश्वर) ही हैं। आज्ञा चक्र की देव मूर्तियों में शिव और शक्ति एक ही रूप में संयुक्त हैं। इसका अर्थ है कि आज्ञा चक्र में चेतना और प्रकृति पहले ही संयुक्त है, किन्तु अभी भी वे पूर्ण ऐक्य में समाए नहीं हैं।

🌘इस चक्र के गुण हैं - एकता, शून्य, सत, चित्त और आनंद।

🌘 'ज्ञान नेत्र' भीतर खुलता है और हम आत्मा की वास्तविकता देखते हैं - इसलिए 'तीसरा नेत्र' का प्रयोग किया गया है जो भगवान शिव का द्योतक है। आज्ञा चक्र 'आंतरिक गुरू' की पीठ (स्थान) है। यह द्योतक है बुद्धि और ज्ञान का, जो सभी कार्यों में अनुभव किया जा सकता है। उच्चतर, नैतिक विवेक के तर्कयुक्त शक्ति के समक्ष अहंकार आधारित प्रतिभा समर्पण कर चुकी है। तथापि, इस चक्र में एक रुकावट का उल्टा प्रभाव है जो व्यक्ति की परिकल्पना और विवेक की शक्ति को कम करता है, जिसका परिणाम भ्रम होता है।
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*🌷आइये जाने उच्च तथा नीच राशि के ग्रह—🌷*






*ज्योतिष में रूचि रखने वाले लोगों के मन में उच्च तथा नीच राशियों में स्थित ग्रहों को लेकर एक प्रबल धारणा बनी हुई है कि अपनी उच्च राशि में स्थित ग्रह सदा शुभ फल देता है तथा अपनी नीच राशि में स्थित ग्रह सदा नीच फल देता है। उदाहरण के लिए शनि ग्रह को तुला राशि में स्थित होने से अतिरिक्त बल प्राप्त होता है तथा इसीलिए तुला राशि में स्थित शनि को उच्च का शनि कह कर संबोधित किया जाता है और अधिकतर ज्योतिषियों का यह मानना है कि तुला राशि में स्थित शनि कुंडली धारक के लिए सदा शुभ फलदायी होता है।*

*किंतु यह धारणा एक भ्रांति से अधिक कुछ नहीं है तथा इसका वास्तविकता से कोई सरोकार नहीं है और इसी भ्रांति में विश्वास करके बहुत से ज्योतिष प्रेमी जीवन भर नुकसान उठाते रहते हैं क्योंकि उनकी कुंडली में तुला राशि में स्थित शनि वास्तव में अशुभ फलदायी होता हैतथा वे इसे शुभ फलदायी मानकर अपने जीवन में आ रही समस्याओं का कारण दूसरे ग्रहों में खोजते रहते हैं तथा अपनी कुंडली में स्थित अशुभ फलदायी शनि के अशुभ फलों में कमी लाने का कोई प्रयास तक नहीं करते। इस चर्चा को आगे बढ़ाने से पहले आइए एक नज़र में ग्रहों के उच्च तथा नीच राशियों में स्थित होने की स्थिति पर विचार कर लें।नवग्रहों में से प्रत्येक ग्रह को किसी एक राशि विशेष में स्थित होने से अतिरिक्त बल प्राप्त होता है जिसे इस ग्रह की उच्च की राशि कहा जाता है। इसी तरह अपनी उच्च की राशि से ठीक सातवीं राशि में स्थित होने पर प्रत्येक ग्रह के बल में कमी आ जाती है तथा इस राशि को इस ग्रह की नीच की राशि कहा जाता है। उदाहरण के लिए शनि ग्रह की उच्च की राशि तुला है तथा इस राशि से ठीक सातवीं राशि अर्थात मेष राशि शनि ग्रह की नीच की राशि है तथा मेष में स्थित होने से शनि ग्रह का बल क्षीण हो जाता है। इसी प्रकार हर एक ग्रह की 12 राशियों में से एक उच्च की राशि तथा एक नीच की राशि होती है।*

*किंतु यहां पर यह समझ लेना अति आवश्यक है कि किसी भी ग्रह के अपनी उच्च या नीच की राशि में स्थित होने का संबंध केवल उसके बलवान या बलहीन होने से होता है न कि उसके शुभ या अशुभ होने से। तुला में स्थित शनि भी कुंडली धारक को बहुत से अशुभ फल दे सकता है जबकि मेष राशि में स्थित नीच राशि का शनि भी कुंडली धारक को बहुतसे लाभ दे सकता है। इसलिए ज्योतिष में रूचि रखने वाले लोगों को यह बात भली भांति समझ लेनी चाहिए कि उच्च या नीच राशि में स्थित होने का प्रभाव केवल ग्रह के बल पर पड़ता है न कि उसके स्वभाव पर। पारम्परिक भारतीय ज्योतिष कभी यह नहीं कहती कि उच्च का ग्रह हमेशा अच्छे परिणाम देगा और नीच का ग्रह हमेशा खराब परिणाम देगा। लेकिन हेमवंता नेमासा काटवे की मानें तो उच्च ग्रह हमेशा खराब परिणाम देंगे और नीच ग्रह अच्छे परिणाम देंगे। इसके पीछे उनका मंतव्य मुझे यह नजर आता है कि जब कोई ग्रह उच्च का होता है तो वह इतनी तीव्रता से परिणाम देता है कि व्यक्ति की जिंदगी में कर्मों से अधिक प्रभावी परिणाम देने लगता है। यानि व्यक्ति कोई एक काम करना चाहे और ग्रह उसे दूसरी ओर लेकर जाएं। इस तरह व्यक्ति की जिंदगी में संघर्ष बढ़ जाता है। इसी वजह से काटवे ने उच्च के ग्रहों को खराब कहा होगा।कुछ परिस्थितियां ऐसी भी होती हैं जब नीच ग्रह उच्च का परिणाम देते हैं। यह मुख्य रूप से लग्न में बैठे नीच ग्रह के लिए कहा गया है। मैंने तुला लग्न में सूर्य और गुरू की युति अब तक चार बार देखी है।तुला लग्न में सूर्य नीच का हुआ और गुरू अकारक।अगर टर्मिनोलॉजी के अनुसार गणना की जाए तो सबसे निकृष्ट योग बनेगा। लेकिन ऐसा नहीं होता। लग्न में सूर्य उच्च का परिणाम देता है और वास्तव में देखा भी यही गया। लग्न में उच्च का सूर्य गुरू के साथ हो तो जातक अपने संस्थान में शीर्ष स्थान पर पहुंचता है॥*

*आइए कुछ तथ्यों की सहायता से इस विचार को समझने का प्रयास करते हैं। शनि नवग्रहों में सबसेधीमी गति से भ्रमण करते हैं तथा एक राशि में लगभग अढ़ाई वर्ष तक रहते हैं अर्थात शनि अपनी उच्च की राशि तुला तथा नीच की राशि मेष में भी अढ़ाई वर्ष तक लगातार स्थित रहते हैं। यदि ग्रहों के अपनी उच्च या नीच राशियों में स्थित होने से शुभ या अशुभ होने की प्रचलित धारणा को सत्य मान लिया जाए तो इसका अर्थ यह निकलता है कि शनि के तुला में स्थित रहने के अढ़ाई वर्ष के समय काल में जन्में प्रत्येक व्यक्ति के लिए शनि शुभ फलदायी होंगे क्योंकि इन वर्षों में जन्में सभी लोगों की जन्म कुंडली में शनि अपनी उच्च की राशि तुला में ही स्थित होंगे। यह विचार व्यवहारिकता की कसौटी पर बिलकुल भी नहीं टिकता क्योंकि देश तथा काल के हिसाब से हर ग्रह अपना स्वभाव थोड़े-थोड़े समय के पश्चात ही बदलता रहता है तथा किसी भी ग्रह का स्वभाव कुछ घंटों के लिए भी एक जैसा नहीं रहता,फिर अढ़ाई वर्ष तो बहुत लंबा समय है।*

*इसलिए ग्रहों के उच्च या नीच की राशि में स्थित होने का मतलब केवल उनके बलवान या बलहीन होने से समझना चाहिए न कि उनके शुभ या अशुभ होने से। मैने अपने ज्योतिष अभ्यास के कार्यकाल में ऐसी बहुत सी कुंडलियां देखी हैं जिनमें अपनी उच्च की राशि में स्थित कोई ग्रह बहुत अशुभ फल दे रहा होता है।क्योंकि अपनी उच्च की राशि में स्थित होने से ग्रह बहुत बलवान हो जाता है, इसलिए उसके अशुभ होने की स्थिति में वह अपने बलवान होने के कारण सामान्य से बहुत अधिक हानि करता है।इसी तरह मेरे अनुभव में ऐसीं भी बहुत सी कुंडलियां आयीं हैं जिनमें कोई ग्रह अपनी नीच की राशि में स्थित होने पर भी स्वभाव से शुभ फल दे रहा होता है किन्तु बलहीन होने के कारण इन शुभ फलों में कुछ न कुछ कमी रह जाती है। ऐसे लोगों को अपनी कुंडली में नीच राशि में स्थित किन्तु शुभ फलदायी ग्रहों के रत्न धारण करने से बहुत लाभ होता है क्योंकि ऐसे ग्रहों के रत्न धारण करने से इन ग्रहों को अतिरिक्त बल मिलता है तथा यह ग्रह बलवान होकर अपने शुभ फलों में वृद्धि करने में सक्षम हो जाते हैं।हर ग्रह अपनी उच्च राशि में तीव्रता से परिणाम देता है और नीच राशि में मंदता के साथ। अगर वह ग्रह आपकी कुण्डली में अकारक है तो कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह उच्च का है या नीच का। सूर्य मेष में, चंद्र वृष में, बुध कन्या में,गुरू कर्क में, मंगल मकर में, शनि तुला में और शुक्र मीन राशि में उच्च के परिणाम देते हैं।यानि पूरी तीव्रता से परिणाम देते हैं।इसी तरह सूर्य तुला में, चंद्रमा वृश्चिक में, बुध मीन में, गुरू मकर में, मंगल कर्क में, शुक्र कन्या में और शनि मेष में नीच का परिणाम देते हैं।*

*अब हम ग्रह एवं राशियों के कुछ वर्गीकरण को जानेंगे जो कि फलित ज्योतिष के लिए अत्यन्त ही महत्वपूर्ण हैं।पहला वर्गीकरण शुभ ग्रह और पाप ग्रह का इस प्रकार है -*

*शुभ ग्रह: चन्द्रमा, बुध, शुक्र, गुरू हैं॥*

*पापी ग्रह: सूर्य, मंगल, शनि, राहु, केतु हैं।*

*साधारणत चन्द्र एवं बुध को सदैव ही शुभ नहीं गिना जाता। पूर्ण चन्द्र अर्थात पूर्णिमा के पास का चन्द्र शुभ एवं अमावस्या के पास का चन्द्र शुभ नहीं गिना जाता। इसी प्रकार बुध अगर शुभ ग्रह के साथ हो तो शुभ होता है और यदि पापी ग्रह के साथ हो तो पापी हो जाता है।यह ध्यान रखने वाली बात है कि सभी पापी ग्रह सदैव ही बुरा फल नहीं देते। न ही सभी शुभ ग्रह सदैव ही शुभ फल देते हैं। अच्छा या बुरा फल कई अन्य बातों जैसे ग्रह का स्वामित्व, ग्रह की राशि स्थिति,दृष्टियों इत्यादि पर भी निर्भर करता है।जिसकी चर्चा हम आगे करेंगे।जैसा कि उपर कहा गया एक ग्रह का अच्छा या बुरा फल कई अन्य बातों पर निर्भर करता है और उनमें से एक है ग्रह की राशि में स्थिति। कोई भी ग्रह सामान्यत अपनी उच्च राशि, मित्र राशि, एवं खुद की राशि में अच्छा फल देते हैं। इसके विपरीत ग्रह अपनी नीच राशि और शत्रु राशि में बुरा फल देते हैं।*

*ग्रहों की उच्चादि राशि स्थिति इस प्रकार है —-*

*ग्रह                    उच्च राशि                   नीच राशि                 स्वग्रह राशि*
*1                       सूर्य,मेष                      तुला                          सिंह*
*2                       चन्द्रमा,वृषभ             वृश्चिक                        कर्क*
*3                       मंगल, मकर               कर्क                     मेष, वृश्चिक*
*4                       बुध, कन्या                 मीन                    मिथुन, कन्या*
*5                       गुरू, कर्क                 मकर                    धनु, मीन*
*6                       शुक्र, मीन                 कन्या                  वृषभ, तुला*
*7                       शनि, तुला                मेष                     मकर, कुम्भ*
*8                        राहु,                        धनु                        मिथुन*
*9                        केतु                       मिथुन                        धनु*

*उपर की तालिका में कुछ ध्यान देने वाले बिन्दु इस प्रकार हैं -1 ग्रह की उच्च राशि और नीच राशि एक दूसरे से सप्तम होती हैं। उदाहरणार्थ सूर्य मेष में उच्च का होता है जो कि राशि चक्र की पहली राशि है और तुला में नीच होता है जो कि राशि चक्र की सातवीं राशि है।2 सूर्य और चन्द्र सिर्फ एक राशि के स्वामी हैं।*

*राहु एवं केतु किसी भी राशि के स्वामी नहीं हैं। अन्य ग्रह दो-दो राशियों के स्वामी हैं।3 राहु एवं केतु की अपनी कोई राशि नहीं होती। राहु-केतु की उच्च एवं नीच राशियां भी सभी ज्योतिषी प्रयोग नहीं करते हैं।*

*सभी ग्रहों के बलाबल का राशि और अंशों के आधार पर मूल्यांकन किया जाता है। एक राशि में 30ए अंश होते हैं।ग्रहों के सूक्ष्म विश्लेषण के लिए ग्रह किस राशि में कितने अंश पर है यह ज्ञान होना अनिवार्य है।सभी नौ ग्रहों की स्थिति का विश्लेषणइस प्रकार है-*

*सूर्य- सूर्य सिंह राशि में स्वग्रही होता है। 1ए से 10ए अंश तक उच्च का माना जाता है। तुला के 10ए अंश तक नीच का होता है। 1ए से 20ए अंश तक मूल त्रिकोणस्थ माना जाता है। सिंह में ही 21ए से 30ए अंश तक स्वक्षेत्री होता है।*

*चंद्र- कर्क राशि मेंचंद्रमा स्वग्रही अथवा स्वक्षेत्री माना जाता है,परन्तु वृष राशि में 3ए अंश तक उच्च का और वृश्चिक राशि में 3ए अंश तक नीच का होता है। वृष राशि में ही 4ए से 30ए अंश तक मूल त्रिकोणस्थ तथा कर्क राशि में 1ए से 30ए अंश तक स्वक्षेत्री माना जाता है।*

*मंगल- मंगल मेष तथा वृश्चिक राशियों में स्वग्रही होता है। मकर राशि में 1ए से 28ए अंश तक उच्च का तथा कर्क राशि में 1ए से 28ए अंश तक नीच का माना जाता है। मेष राशि में 1ए से 18ए अंश तक मूल त्रिकोणस्थ होता है और 19ए से 20ए अंश तक स्वक्षेत्री कहा जाता है।*

*बुध- बुध ग्रह कन्या और मिथुन राशियों में स्वग्रही होता है परंतु कन्या राशि में 15ए अंश तक उच्च का और मीन राशि में 15ए अंश तक नीच का होता है। कन्या राशि में ही 16ए से 20ए अंश तक मूल त्रिकोणस्थ और इसी राशि में 21ए से 30ए अंश तक स्वक्षेत्री कहलाता है।*

*गुरू- गुरू धनु और मीन राशियों में स्वग्रही या स्वक्षेत्री होता है।कर्क राशि में 5ए अंश तक उच्च का और मकर राशि में 5ए अंश तक नीच का होता है। 1ए से 10ए अंश तक मूल त्रिकोणस्थ तथा धनु राशि में ही 14ए से 30ए अंश तक स्वक्षेत्री माना जाता है।*

*शुक्र- शुक्र ग्रह अपनी दो राशियों वृष और तुला में स्वग्रही होता है। मीन राशि में 27ए अंश तक उच्च का और कन्या राशि में 27ए अंश तक नीच का होता है। तुला राशि में 1ए से 10ए अंश तक मूल त्रिकोणस्थ और उसी राशि में 11ए से 30ए अंश तक स्वक्षेत्री होता है।*

*शनि- शनि अपनी दो राशियों कुंभ और मकर में स्वग्रही होता है। तुला में 1ए से 20ए अंश तक उच्च का और मेष में 20ए अंश तक नीच का होता है। कुंभ राशि में ही शनि 1ए से 20ए अंश तक मूल त्रिकोण का होता है। उसके बाद 21ए से 30ए अंश तक स्वक्षेत्री होता है।*

*राहू- कन्या राशि का स्वामी मिथुन और वृष में उच्च का होता है। धनु में नीच का कर्क में मूल त्रिकोस्थ माना जाता है।*

*केतु- केतु मिथुन राशि का स्वामी है। 15ए अंश तक धनु और वृश्चिक राशि में उच्च का होता है। 15ए अंश तक मिथुन राशि में नीच का, सिंह राशि में मूल त्रिकोण का और मीन में स्वक्षेत्री होता है।वृष राशि में ही यह नीच का होता है।*

*जन्म कुंडली का विश्लेषण अंशों के आधार पर करने पर ही ग्रहों के वास्तविक बलाबल को ज्ञात किया जाता है। उदाहरण के लिए सिंह लग्न की जन्म कुंडली में सूर्य लग्न में बैठे होने से वह स्वग्रही है। यह जातक को मान सम्मान, धनधान्य बचपन से दिला रहा है। दशम भाव में वृष का चंद्रमा होने से जातक उत्तरोत्तर उन्नति करता रहेगा। अत: यह दो ग्रह ही उसके भाग्यवर्धक होंगे।*

*नीच भंग राज योग —–ग्रह अगर नीच राशि में बैठा हो या शत्रु भाव में तो आम धारणा यह होती है कि जब उस ग्रह की दशा आएगी तब वह जिस घर में बैठा है उस घर से सम्बन्धित विषयों में नीच का फल देगा. लेकिन इस धारणा से अगल एक मान्यता यह है कि नीच में बैठा ग्रह भी कुछ स्थितियों में राजगयोग के समान फल देता है. इस प्रकार के योग को नीच भंग राजयोग के नाम से जाना जाता है.*

*नीच भंग राजयोग के लिए आवश्यक स्थितियां——ज्योतिषशास्त्र के नियमों में बताया गया है कि नवमांश कुण्डली में अगर ग्रह उच्च राशि में बैठा हो तो जन्म कुण्डली में नीच राशि में होते हुए भी वह नीच का फल नहीं देता है. इसका कारण यह है कि इस स्थिति में उनका नीच भंग हो जाता है.जिस राशि में नीच ग्रह बैठा हो उस राशि का स्वामी ग्रह उसे देख रहा हो अथवा जिस राशि में ग्रह नीच होकर बैठा हो उस राशि का स्वामी स्वगृही होकर साथ में बैठा हो तो स्वत: ही ग्रह का नीच भंग हो जाता है।*

 *नीच भंग के संदर्भ में एक नियम यह भी है कि नीच राशि में बैठा ग्रह अगर अपने सामने वाले घर यानी अपने से सातवें भाव में बैठे नीच ग्रह को देख रहा है,तो दोनों नीच ग्रहों का नीच भंग हो जाता है.अगर आपकी कुण्डली में ये स्थितियां नहीं बनती हों तो इन नियमों से भी नीच भंग का आंकलन कर सकते हैं जैसे जिस राशि में ग्रह नीच होकर बैठे हों उस राशि के स्वामी अपनी उच्च राशि में विराजमान हों तो नीच ग्रह का दोष नहीं लगता है।*

*एक नियम यह भी है कि जिस राशि में ग्रह नीच का होकर बैठा है उस ग्रह का स्वामी जन्म राशि से केन्द्र में विराजमान है साथ ही जिस राशि में नीच ग्रह उच्च का होता है उस राशि का स्वामी भी केन्द्र में बैठा हो तो सर्वथा नीच भंग राज योग बनता है. अगर यह स्थिति नहीं बनती है तो लग्न भी इस का आंकलन किया जा सकता है।यानी जिस राशि में ग्रह नीच होकर बैठा उस राशि का स्वामी एवं जिस राशि में नीच ग्रह उच्च का होता है।उसका स्वामी लग्न से कहीं भी केन्द्र में स्थित हों तो नीच भंग राज योग का शुभ फल देता है.अगर आपकी कुण्डली में ग्रह नीच राशियों में बैठे हैं तो इन स्थितियों को देखकर आप स्वयं अंदाजा लगा सकते हैं कि आपकी कुण्डली में नीच राशि में बैठा ग्रह नीच का फल देगा अथवा यह नीच भंग राजयोग बनकर आपको अत्यंत शुभ फल प्रदान करेगा.*

*नीच भंग राजयोग का फल—–नीच भंग राज योग कुण्डली में एक से अधिक होने पर भी उसी प्रकार फल देता है जैसे एक नीच भंग राज योग होने पर .आधुनिक परिवेश में ज्योतिषशास्त्री मानते है कि ऐसा नहीं है कि इस योग के होने से व्यक्ति जन्म से ही राजा बनकर पैदा लेता है. यह योग जिनकी कुण्डली में बनता है उन्हें प्रारम्भ में कुछ मुश्किल हालातों से गुजरना पड़ता है जिससे उनका ज्ञान व अनुभव बढ़ता है तथा कई ऐसे अवसर मिलते हैं जिनसे उम्र के साथ-साथ कामयाबी की राहें प्रशस्त होती जाती हैं.यह योग व्यक्ति को आमतौर पर राजनेता, चिकित्सा विज्ञान एवं धार्मिक क्षेत्रों में कामयाबी दिलाता है जिससे व्यक्ति को मान-सम्मान व प्रतिष्ठा मिलती है. वैसे इस योग के विषय में यह धारणा भी है कि जिस व्यक्ति की कुण्डली में जिस राशि में ग्रह नीच होकर बैठा है उस राशि का स्वामी एवं उस ग्रह की उच्च राशि का स्वामी केन्द्र स्थान या त्रिकोण में बैठा हो तो व्यक्ति महान र्धमात्मा एवं राजसी सुखों को भोगने वाला होता है.इसी प्रकार नवमांश में नीच ग्रह उच्च राशि में होने पर भी समान फल मिलता है.*
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Thursday, August 24, 2017

*🌷गणेश चतुर्थी🌷*





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*अमृत योग में आएगी गणेश चतुर्थी*

*1. अमृत योग - 25 अगस्त 2017 - प्रातः 06:06 से रात्रि 08:32 तक*

*2. रवि योग - 25 अगस्त 2017 - प्रातः 06:06 से दोपहर 02:35 तक*

*25 अगस्त 2017 को मनाई जाएगी महागणपति चतुर्थी एवं कलंक चतुर्थी*

*(चंद्र दर्शन नहीं करे)*

*नोट : रात्रि 09 बजकर 18 मिनट तक चन्द्रदर्शन नहीं करे क्योंकि इस दिन कलंकचौथ है, मान्यता के अनुसार जो भी इस दिन चंद्र का दर्शन करता है, उस पर कोई न कोई कलंक अवश्य  लगता है।*

*गणेश पूजन का समय :- भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी दिनाङ्क 25 अगस्त 2017 को चतुर्थी तिथि रात्रि 08:31 तक रहेगी। अत: 25 अगस्त को चतुर्थी चन्द्रोदव्यापिनी होने से महागणपति चतुर्थी (गणेशचौथ) इसी दिन मनायी जाएगी। गणेश पूजन का श्रेष्ठ समय - चर का चौघडिय़ा प्रात: 06:05 से प्रात: 07:42 तक रहेगा। लाभ का चौघडिय़ा प्रात: 07:42 से प्रात: 09:17 तक, अमृत का चौघडिय़ा प्रात: 09:17 से प्रात: 10:53 तक, शुभ का चौघडिय़ा दोपहर 12:28 से दोपहर 02:04 तक, चर का चौघडिय़ा सायं 05:15 से सायं 06:51 तक तथा अभिजित दोपहर 12:05 से दोपहर 12:53 तक रहेगा।*

*गणेश चतुर्थी पूजा विधि :- नारद पुराण के अनुसार भाद्रपद मास की शुक्ल चतुर्थी को विनायक व्रत करना चाहिए। यह व्रत करने कुछ प्रमुख नियम निम्न हैं:*

*इस व्रत में आवाहन, प्रतिष्ठापन, आसन समर्पण, दीप दर्शन आदि द्वारा गणेश पूजन करना चाहिए।*

*पूजा में दूर्वा अवश्य शामिल करें।*

*गणेश जी के विभिन्न नामों से उनकी आराधना करनी चाहिए।*

*नैवेद्य के रूप में पांच लड्डू रखें।*

*इस दिन रात के समय चन्द्रमा की तरफ नहीं देखना चाहिए, ऐसा माना जाता है कि इसे देखने पर झूठे आरोप झेलने पड़ते हैं।*

*अगर रात के समय चन्द्रमा दिख जाए तो उसकी शांति के लिए पूजा करानी चाहिए।*

*हिन्दू पंचांग के अनुसार प्रत्येक वर्ष भाद्रपद मास के शुक्ल चतुर्थी को हिन्दुओं का प्रमुख त्यौहार गणेश चतुर्थी मनाया जाता है। गणेश पुराण में वर्णित कथाओं के अनुसार इसी दिन समस्त विघ्न बाधाओं को दूर करने वाले, कृपा के सागर तथा भगवान शंकर और माता पार्वती के पुत्र श्री गणेश जी का आविर्भाव हुआ था।*

*गणेश चतुर्थी पर्व 2017*

*भगवान विनायक के जन्मदिवस पर मनाया जानेवाला यह महापर्व महाराष्ट्र सहित भारत के सभी राज्यों में हर्षोल्लास पूर्वक और भव्य तरीके से आयोजित किया जाता है। इस साल गणेश चतुर्थी का पर्व 25 अगस्त के दिन मनाया जाएगा।*

*गणेश चतुर्थी की कथा*

*कथानुसार एक बार मां पार्वती स्नान करने से पूर्व अपनी मैल से एक सुंदर बालक को उत्पन्न किया और उसका नाम गणेश रखा। फिर उसे अपना द्वारपाल बना कर दरवाजे पर पहरा देने का आदेश देकर स्नान करने चली गई। थोड़ी देर बाद भगवान शिव आए और द्वार के अन्दर प्रवेश करना चाहा तो गणेश ने उन्हें अन्दर जाने से रोक दिया। इसपर भगवान शिव क्रोधित हो गए और अपने त्रिशूल से गणेश के सिर को काट दिया और द्वार के अन्दर चले गए। जब मां पार्वती ने पुत्र गणेश जी का कटा हुआ सिर देखा तो अत्यंत क्रोधित हो गई। तब ब्रह्मा, विष्णु सहित सभी देवताओं ने उनकी स्तुति कर उनको शांत किया और भोलेनाथ से बालक गणेश को जिंदा करने का अनुरोध किया। महामृत्युंजय रुद्र उनके अनुरोध को स्वीकारते हुए एक गज के कटे हुए मस्तक को श्री गणेश के धड़ से जोड़ कर उन्हें पुनर्जीवित कर दिया।*

*गणेश चतुर्थी पूजा विधि*

*इस महापर्व पर लोग प्रातः काल उठकर सोने, चांदी, तांबे अथवा मिट्टी के गणेश जी की प्रतिमा स्थापित कर षोडशोपचार विधि से उनका पूजन करते हैं। पूजन के पश्चात् नीची नज़र से चंद्रमा को अर्घ्य देकर ब्राह्मणों को दक्षिणा देते हैं। इस पूजा में गणपति को 21 लड्डुओं का भोग लगाने का विधान है। मान्यता के अनुसार इन दिन चंद्रमा की तरफ नही देखना चाहिए।*

*अंगारकी चतुर्थी पूजन*

*गणेश को सभी देवताओं में प्रथम पूज्य एवं विध्न विनाशक है. श्री गणेश जी बुद्धि के देवता है, इनका उपवास रखने से मनोकामना की पूर्ति के साथ साथ बुद्धि का विकास व कार्यों में सिद्धि प्राप्त होती है. श्री गणेश को चतुर्थी तिथि बेहद प्रिय है, व्रत करने वाले व्यक्ति को इस तिथि के दिन प्रात: काल में ही स्नान व अन्य क्रियाओं से निवृत होना चाहिए. इसके पश्चात उपवास का संकल्प लेना चाहिए. संकल्प लेने के लिये हाथ में जल व दूर्वा लेकर गणपति का ध्यान करते हुए, संकल्प में यह मंत्र बोलना चाहिए "मम सर्वकर्मसिद्धये सिद्धिविनायक पूजनमहं करिष्ये"*

*इसके पश्चात सोने या तांबे या मिट्टी से बनी प्रतिमा चाहिए. इस प्रतिमा को कलश में जल भरकर, कलश के मुँह पर कोरा कपडा बांधकर, इसके ऊपर प्रतिमा स्थापित करनी चाहिए. पूरा दिन निराहार रहते हैं. संध्या समय में पूरे विधि-विधान से गणेश जी की पूजा की जाती है. रात्रि में चन्द्रमा के उदय होने पर उन्हें अर्ध्य दिया जाता है.*
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9472998128.. चतुर्थी🌷*

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*अमृत योग में आएगी गणेश चतुर्थी*

*1. अमृत योग - 25 अगस्त 2017 - प्रातः 06:06 से रात्रि 08:32 तक*

*2. रवि योग - 25 अगस्त 2017 - प्रातः 06:06 से दोपहर 02:35 तक*

*25 अगस्त 2017 को मनाई जाएगी महागणपति चतुर्थी एवं कलंक चतुर्थी*

*(चंद्र दर्शन नहीं करे)*

*नोट : रात्रि 09 बजकर 18 मिनट तक चन्द्रदर्शन नहीं करे क्योंकि इस दिन कलंकचौथ है, मान्यता के अनुसार जो भी इस दिन चंद्र का दर्शन करता है, उस पर कोई न कोई कलंक अवश्य  लगता है।*

*गणेश पूजन का समय :- भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी दिनाङ्क 25 अगस्त 2017 को चतुर्थी तिथि रात्रि 08:31 तक रहेगी। अत: 25 अगस्त को चतुर्थी चन्द्रोदव्यापिनी होने से महागणपति चतुर्थी (गणेशचौथ) इसी दिन मनायी जाएगी। गणेश पूजन का श्रेष्ठ समय - चर का चौघडिय़ा प्रात: 06:05 से प्रात: 07:42 तक रहेगा। लाभ का चौघडिय़ा प्रात: 07:42 से प्रात: 09:17 तक, अमृत का चौघडिय़ा प्रात: 09:17 से प्रात: 10:53 तक, शुभ का चौघडिय़ा दोपहर 12:28 से दोपहर 02:04 तक, चर का चौघडिय़ा सायं 05:15 से सायं 06:51 तक तथा अभिजित दोपहर 12:05 से दोपहर 12:53 तक रहेगा।*

*गणेश चतुर्थी पूजा विधि :- नारद पुराण के अनुसार भाद्रपद मास की शुक्ल चतुर्थी को विनायक व्रत करना चाहिए। यह व्रत करने कुछ प्रमुख नियम निम्न हैं:*

*इस व्रत में आवाहन, प्रतिष्ठापन, आसन समर्पण, दीप दर्शन आदि द्वारा गणेश पूजन करना चाहिए।*

*पूजा में दूर्वा अवश्य शामिल करें।*

*गणेश जी के विभिन्न नामों से उनकी आराधना करनी चाहिए।*

*नैवेद्य के रूप में पांच लड्डू रखें।*

*इस दिन रात के समय चन्द्रमा की तरफ नहीं देखना चाहिए, ऐसा माना जाता है कि इसे देखने पर झूठे आरोप झेलने पड़ते हैं।*

*अगर रात के समय चन्द्रमा दिख जाए तो उसकी शांति के लिए पूजा करानी चाहिए।*

*हिन्दू पंचांग के अनुसार प्रत्येक वर्ष भाद्रपद मास के शुक्ल चतुर्थी को हिन्दुओं का प्रमुख त्यौहार गणेश चतुर्थी मनाया जाता है। गणेश पुराण में वर्णित कथाओं के अनुसार इसी दिन समस्त विघ्न बाधाओं को दूर करने वाले, कृपा के सागर तथा भगवान शंकर और माता पार्वती के पुत्र श्री गणेश जी का आविर्भाव हुआ था।*

*गणेश चतुर्थी पर्व 2017*

*भगवान विनायक के जन्मदिवस पर मनाया जानेवाला यह महापर्व महाराष्ट्र सहित भारत के सभी राज्यों में हर्षोल्लास पूर्वक और भव्य तरीके से आयोजित किया जाता है। इस साल गणेश चतुर्थी का पर्व 25 अगस्त के दिन मनाया जाएगा।*

*गणेश चतुर्थी की कथा*

*कथानुसार एक बार मां पार्वती स्नान करने से पूर्व अपनी मैल से एक सुंदर बालक को उत्पन्न किया और उसका नाम गणेश रखा। फिर उसे अपना द्वारपाल बना कर दरवाजे पर पहरा देने का आदेश देकर स्नान करने चली गई। थोड़ी देर बाद भगवान शिव आए और द्वार के अन्दर प्रवेश करना चाहा तो गणेश ने उन्हें अन्दर जाने से रोक दिया। इसपर भगवान शिव क्रोधित हो गए और अपने त्रिशूल से गणेश के सिर को काट दिया और द्वार के अन्दर चले गए। जब मां पार्वती ने पुत्र गणेश जी का कटा हुआ सिर देखा तो अत्यंत क्रोधित हो गई। तब ब्रह्मा, विष्णु सहित सभी देवताओं ने उनकी स्तुति कर उनको शांत किया और भोलेनाथ से बालक गणेश को जिंदा करने का अनुरोध किया। महामृत्युंजय रुद्र उनके अनुरोध को स्वीकारते हुए एक गज के कटे हुए मस्तक को श्री गणेश के धड़ से जोड़ कर उन्हें पुनर्जीवित कर दिया।*

*गणेश चतुर्थी पूजा विधि*

*इस महापर्व पर लोग प्रातः काल उठकर सोने, चांदी, तांबे अथवा मिट्टी के गणेश जी की प्रतिमा स्थापित कर षोडशोपचार विधि से उनका पूजन करते हैं। पूजन के पश्चात् नीची नज़र से चंद्रमा को अर्घ्य देकर ब्राह्मणों को दक्षिणा देते हैं। इस पूजा में गणपति को 21 लड्डुओं का भोग लगाने का विधान है। मान्यता के अनुसार इन दिन चंद्रमा की तरफ नही देखना चाहिए।*

*अंगारकी चतुर्थी पूजन*

*गणेश को सभी देवताओं में प्रथम पूज्य एवं विध्न विनाशक है. श्री गणेश जी बुद्धि के देवता है, इनका उपवास रखने से मनोकामना की पूर्ति के साथ साथ बुद्धि का विकास व कार्यों में सिद्धि प्राप्त होती है. श्री गणेश को चतुर्थी तिथि बेहद प्रिय है, व्रत करने वाले व्यक्ति को इस तिथि के दिन प्रात: काल में ही स्नान व अन्य क्रियाओं से निवृत होना चाहिए. इसके पश्चात उपवास का संकल्प लेना चाहिए. संकल्प लेने के लिये हाथ में जल व दूर्वा लेकर गणपति का ध्यान करते हुए, संकल्प में यह मंत्र बोलना चाहिए "मम सर्वकर्मसिद्धये सिद्धिविनायक पूजनमहं करिष्ये"*

*इसके पश्चात सोने या तांबे या मिट्टी से बनी प्रतिमा चाहिए. इस प्रतिमा को कलश में जल भरकर, कलश के मुँह पर कोरा कपडा बांधकर, इसके ऊपर प्रतिमा स्थापित करनी चाहिए. पूरा दिन निराहार रहते हैं. संध्या समय में पूरे विधि-विधान से गणेश जी की पूजा की जाती है. रात्रि में चन्द्रमा के उदय होने पर उन्हें अर्ध्य दिया जाता है.*
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Monday, August 21, 2017

राहु मंगल का विध्वंसक योग

10 दिन हो जाइये सावधान बन रहा है राहु मंगल का विध्वंसक योग


राहु-मंगल-का-विध्वंसक-योग
राहु-मंगल-का-विध्वंसक-योग

राहु मंगल का विध्वंसक योग


(दस दिन के लिए रहे ये चार राशि वाले सावधान)


बीते डेढ़ वर्ष से राहु सिंह राशि में गोचर कर रहा था जो की अब 18 अगस्त 2017 को राशि परिवर्तन कर कर्क राशि में प्रवेश कर गया है।


18 अगस्त को प्रातः राहु का कर्क राशि में प्रवेश हो गया है राहु का राशि परिवर्तन करना तो ज्योतिषीय गणनाओं में बहुत महत्वपूर्ण घटना होती ही है पर यहाँ जो एक विशेष स्थिति बन रही है।

◆ वो यह है के 18 अगस्त को राहु का कर्क राशि में प्रवेश हो गया है तथा मंगल पहले से ही अपनी नीच राशि कर्क में गोचर कर रहा है जिससे 18 अगस्त को राहु के कर्क में प्रवेश करते ही कर्क राशि में राहु और मंगल की युति बन गयी है जो की 27 अगस्त तक बनी रहेगी 27 अगस्त को मंगल के सिंह राशि में आने पर राहु मंगल का नकारात्मक योग समाप्त होगा।

◆ राहु मंगल के योग को ज्योतिष में एक विध्वंसकारी और नकारात्मक योग माना गया है, मंगल और राहु दोनों ही क्रोधी प्रवृति और उठा पटक कराने वाले ग्रह हैं।

◆ मंगल को दुर्घटना, एक्सीडेंट्स, वाद विवाद, क्रोध, आर्ग्यूमेंट्स, अग्निदुर्घटना आदि का कारक माना गया है तथा राहु आकस्मिकता, आकस्मिक घटनाएं, षड़यंत्र, मतिभ्रम आदि का कारक है इसलिए राहु और मंगल का योग बनने पर दुर्घटनाओं और वाद विविद की घटनाओं में वृद्धि होती है और उठा पटक का वातावरण उत्पन्न होता है।

◆ 18 अगस्त से 27 अगस्त के बीच दस दिनों के लिए कर्क राशि में राहु और मंगल का योग बनने से इस दस दिनों में सड़क दुर्घटना, अग्नि दुर्घटना, वाद विवाद, आर्ग्यूमेंट्स में वृद्धि होगी और वातावरण में तथा आम मानस के व्यव्हार में भी क्रोध बढ़ेगा।
असमसजिक तत्वों द्वारा अशांति उत्पन्न करना और आतंकवादी घटनाओं की भी सम्भावना होगी, इस लिए 18 अगस्त से 27 अगस्त तक के दस दिनों में कुछ विशेष सावधानियां बरतें।

◆ सबसे पहले तो, अपने व्यवाहर पर नियंत्रण रखें आर्ग्युमेंट्स को एवॉइड करें, और विवादों से बचें।

◆ कोई भी वाहन चलाते समय विशेष सावधानी रखें |

◆ विरोधियों के प्रति सचेत रहें।

◆ प्रॉपर्टी आदि की खरीददारी या लेनदेन इन दस दिनों में न करें।

◆ और विशेष रूप से अपने क्रोध पर नियंत्रण रखें तथा व्यर्थ के विवादों से बचें।

इन राशियों के व्यक्ति रखे विशेष सावधानी –


◆ राहु मंगल के इस दस दिन के योग का नकारात्मक प्रभाव वैसे तो सभी को प्रभावित करेगा पर विशेष रूप से मेष, कर्क, सिंह और धनु राशि के व्यक्तियों के लिए यह ग्रहस्थिति अधिक समस्याकारक होगी, और इसमें भी बहुत विशेष रूप से कर्क और धनु राशि वालो के लिए यह योग सर्वाधिक संघर्षकारी होगा

◆ क्योंकि राहु मंगल का यह योग कर्क राशि में ही बन रहा है जिससे यह राशि सर्वाधिक प्रभावित होगी इसके अलावा यह योग धनु से आठवीं राशि में बनने के कारक धनु राशि के जातकों के लिए भी यह अधिक कष्टकारक है।

◆ मेष राशि के जातकों के लिए विशेषतः गृहक्लेश और पारिवारिक विवाद उत्पन्न होंगे, इसलिए आर्ग्यूमेंट्स से बचें और विवादों को बड़ा रूप ना दें। कर्क राशि के जातकों के लिए उनके क्रोध में वृद्धि होगी और स्वास्थ में उतार चढ़ाव आएगा इसलिए अपने क्रोध पर नियंत्रण रखें और स्वास्थ समस्याओं के प्रति सचेत रहें।

◆ सिंह राशि के जातकों के लिए धन खर्च बढ़ेगा, धन हानि की सम्भावना होगी इसलिए इस समय में आर्थिक लेनदेन में विशेष सावधानी बरतें।

◆ धनु राशि के जातकों के लिए स्वास्थ समस्याएं, एक्सीडेंट या चोट आदि की सम्भावना होगी इसलिए धनु राशि के व्यक्ति विशेष रूप से वाहन चलाने में सावधानी रखें और विवादों से बचें।

अपनी राशि के अनुसार रखें ये सावधानी –


मेष राशि – गृहकलेश और पारिवारिक विवाद से बचें।
वृष राशि – छोटे भाई बहनो से बहस करने से बचें।
मिथुन राशि – आर्थिक लेनदन में सावधानी और वाणी पर नियंत्रण रखें।
कर्क राशि – अपने क्रोध को नियंत्रित रखें, व्यव्हार में संयम बरतें।
सिंह राशि – आर्थिक लेनदेन में सावधानी रखें, व्यर्थ धन खर्च से बचें।
कन्या राशि – बड़े भाई बहनो से बहस करने से बचें।
तुला राशि – ऑफिस में सीनियर्स और बोस से आर्ग्यूमेंट्स करने से बचें।
वृश्चिक राशि – महत्वपूर्ण कार्यो और निर्णयों में सावधानी बरतें।
धनु राशि – वाहन चलाने में सावधानी रखें।
मकर राशि – वैवाहिक जीवन में विवाद करने से बचें।
कुम्भ राशि – विरोधियों से सचेत रखें।
मीन राशि – संतान पक्ष के साथ बहस से बचें, शेयर आदि में इन्वेस्ट न करें।

मित्रो, राहु मंगल योग के नकारात्मक प्रभाव से बचने के लिए सहायक होंगे ये उपायः


★ हनुमान चालीसा और संकट मोचन हनुमानाष्टक का पाठ करें।
★ साबुत उड़द का दान करें।
★ महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें।

धन लाभ विचार

                            || ॐ ||
धनेश (व्दितीय भाव का अधिपति) यदि धन स्थान (व्दितीय भाव) में हो अथवा केंद्र (१, ४, ७, १०) भाव में हो तो जातक को “श्रम से सफलता” (शारीरिक / मानसिक श्रम) मिलती हैं तथा धन लाभ होता हैं |

धन भाव में शुभ ग्रह धनप्रद (धन प्रदान करने वाले) तथा धन भाव में पाप ग्रह धन नाशक (धन हनी करने वाले) होते हैं | यदि धन स्थान पर शुभ ग्रह की दृष्टी या योग हो तब भी जातक को धन लाभ होता रहता हैं |

धनवान योग :-
धनेश यदि लाभ भाव (एकादश भाव) या लाभेश धन स्थान में हो अथवा धनेश तथा लाभेश (एकादश भाव अधिपति) दोनों ही केंद्र अथवा त्रिकोण (१, ४, ५, ७, ९, १०) में स्थित हो तो मनुष्य धनवान होता हैं |

व्यय योग :-
यदि धनेश त्रिक भाव (६, ८, १२) में स्थित हो तो जातक को आवक से ज्यादा खर्च की चिंता सताती हैं |

|| ॐ तत् सत् ||
जय श्री नारायण
  पँ अभिषेक कुमार
     9472998128