द्वादश लग्न

द्वादश लग्न नवग्रह फलम (मकर से में लग्न)

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मकर लग्न की कुण्डली में लग्नस्थ ग्रह
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मकर लग्न में जिस व्यक्ति का जन्म होता है वे दुबले पतले होते हैं. समान्यतया इनकी शादी विलम्ब से होती है. इन्हें नियम और अनुशासन पर चलना पसंद होता है. ये थोड़े से जिद्दी और रूढ़िवादी होते हैं ये अपने कार्यों में किसी का हस्तक्षेप पसंद नहीं करते हैं. मकर लग्न में लग्नस्थ ग्रह इन्हें किस प्रकार से प्रभावित करते हैं यह देखिए!

मकर लग्न में लग्नस्थ सूर्य👉 सूर्य मकर लग्न की कुण्डली में अष्टम भाव का स्वामी होता है लग्न भाव में सूर्य की स्थिति होने से व्यक्ति को स्वास्थ्य सम्बन्धी परेशानियों का सामना करना होता है. हड्डियों में दर्द एवं पेट सम्बन्धी रोग की संभावना प्रबल रहती है. दृष्टि दोष की भी संभावना रहती हैं. लालच और स्वार्थ की भावना रहती है. शत्रु राशि में सूर्य की उपस्थिति होने के कारण जीवन में कठिन परिस्थितियों एवं बाधाओं का सामना करना होता है. परिश्रम और आत्मबल से कठिनाईयों पर विजय प्राप्त करते हैं. पिता से तनाव होता है. सगे सम्बन्धियों से भी विरोध का सामना करना होता है. व्यापार की अपेक्षा नौकरी करना पसंद होता है. गृहस्थी में उतार चढ़ाव होता रहता है.

मकर लग्न में लग्नस्थ चन्द्र👉 चन्द्रमा मकर लग्न की कुण्डली में सप्तम भाव का स्वामी होता है. शत्रु राशि में लग्नस्थ होकर चन्द्रमा व्यक्ति को सुन्दर काया प्रदान करता है . चन्द्र के प्रभाव से व्यक्ति का मन चंचल और विनोदी होता है. सौन्दर्य के प्रति आकर्षित होता है. चन्द्र के शत्रु राशि में होने से आंख और कान में तकलीफ का सामना करना होता है. लग्न में बैठा चन्द्र सप्तम भाव में अपनी राशि कर्क को देखता है जिससे जीवनसाथी सुन्दर और गुणी प्राप्त होता है. जीवनसाथी से सहयोग एवं समय समय पर लाभ प्राप्त होता है।

मकर लग्न में लग्नस्थ मंगल👉 मकर लग्न की कुण्डली में मंगल सुखेश और लाभेश होता है. मंगल इस  इस राशि में लग्नस्थ होने से यह व्यक्ति क्रोधी स्वभाव का होता है. इन्हें अपना वर्चस्व बनाये रखना पसंद होता है. पिता एवं पिता पक्ष से सहयोग प्राप्त होता है. पिता के नाम से इन्हें समाज में मान सम्मान एवं आदर प्राप्त होता है. शनि के प्रभाव से जीवन के उत्तरार्द्ध में संभावना ऐसी बनती है कि पिता से विवाद के कारण इन्हें पैतृक सम्पत्ति का त्याग करना होता है. प्रथम भाव में बैठा मंगल चतुर्थ सप्तम एवं अष्टम भाव को देखता है. इन भावो पर मंगल की दृष्टि के कारण व्यक्ति धार्मिक प्रवृति का होता है. मंगली दोष के कारण गृहस्थ जीवन का सुख बाधित होता है।

मकर लग्न में लग्नस्थ बुध👉 बुध मकर लग्न लग्न की कुण्डली में षष्ठेश और नवमेश होता है .बुध लग्नस्थ होने से व्यक्ति बुद्धिमान और ज्ञानी होता है. इन्हें राजकीय सेवा का अवसर प्राप्त होता है. इनमें ईश्वर के प्रति आस्था और दया की भावना रहती है. कला के प्रति अभिरूचि होती है. मान सम्मान एवं यश प्राप्त होता है. आर्थिक स्थिति अच्छी रहती है. सप्तम भाव में स्थित कर्क राशि पर बुध की दृष्टि होने से जीवनसाथी सुन्दर होता है. षष्ठेश की दृष्टि सप्तम भाव पर होने से जीवनसाथी का स्वभाव उग्र होता है. संतान प्राप्ति में विलम्ब होता है।

मकर लग्न में लग्नस्थ गुरू👉 मकर लग्न की कुण्डली में गुरू व्ययेश और तृतीयेश होकर अकारक ग्रह की भूमिका निभाता है. लग्न में गुरू की उपस्थिति से व्यक्ति ज्ञानी और गुणवान होता है. इनकी बौद्धिक क्षमता उत्तम होती है परंतु ये अपने गुण और योग्यता का समुचित उपयोग नहीं कर पाते हैं. दूसरों के विचारों से सदैव प्रभावित रहते हैं जिसके कारण कठिनाईयो का भी सामना करना होता है. लग्नस्थ गुरू की दृष्टि पंचम, सप्तम एवं नवम भाव पर रहती है. गुरू की दृष्टि से विवाह के पश्चात इनका भाग्योदय होता है।

मकर लग्न में लग्नस्थ शुक्र👉 शुक्र मकर लग्न की कुण्डली में पंचमेश और सप्तमेश होता है. इस लग्न के लिए शुक्र शुभ कारक ग्रह होता है. लग्न में इसकी उपस्थिति से व्यक्ति सुन्दर और बुद्धिमान होता है. शुक्र इन्हें चंचल और स्वार्थी बनता है. इनमें अवसरवादिता भी होती है. ये आमतौर पर अपने मतलब से दोस्ती करते हैं. विपरीत लिंग वाले व्यक्ति के प्रति इनमें विशेष आकर्षण होता है. सप्तम भाव में स्थित कर्क राशि पर शुक्र की दृष्टि होने से जीवनसाथी प्यार करने वाला होता है. सुख दु:ख में सहयोग और साथ देता है।

मकर लग्न में लग्नस्थ शनि👉 शनि मकर लग्न की कुण्डली में लग्नेश और द्वितीयेश होता है. लग्नेश होने से यह शुभ और कारक ग्रह होता है. लग्न में शनि की उपस्थिति से व्यक्ति भाग्यशाली होता है. शारीरिक तौर पर हृष्ट पुष्ट और शक्तिशाली होते है परंतु वाणी सम्बन्धी दोष की संभावना रहती है. नौकरी एवं व्यापार दोनो में इन्हें अच्छी सफलता मिलती है. राजकीय सेवा का इन्हें अवसर प्राप्त होता है. माता से स्नेह प्राप्त होता है.सप्तम भाव पर शनि की दृष्टि होने से जीवनसाथी को कष्ट होता है. वैवाहिक जीवन का सुख प्रभावित होता है.

मकर लग्न में लग्नस्थ राहु👉 राहु मकर लग्न की कुण्डली प्रथम भाव में उपस्थित होने से जीवन में स्थायित्व का अभाव होता है. अकारण भटकाव होता है. कार्यो में बाधाएं आती है जिससे बनता हुआ काम बिगड़ जाता है. व्यापार की अपेक्षा नौकरी इनके लिए लाभप्रद होता है. व्यवसाय में कठिनाईयां आती है और हानि की संभावना रहती है. सप्तम भाव पर राहु की दृष्टि साझेदारों एवं मित्रों से अपेक्षित सहयोग में बाधक होता है. गृहस्थ जीवन के सुख में न्यूनता लाता है.

मकर लग्न में लग्नस्थ केतु👉 मकर लग्न की कुण्डली में केतु प्रथम भाव में स्थित होने से व्यक्ति के स्वास्थ्य में उतार चढ़ाव होता रहता है. समय समय पर विभिन्न प्रकार की कठिनाईयों एवं मुश्किलों का सामना करना होता है. विपरीत लिंग वाले व्यक्ति के प्रति विशेष आकर्षण होता है. शत्रुओं के कारण इन्हें कष्ट होता है. समाज में मान सम्मान के लिए अनुचित साधनों का प्रयोग करते हैं जिसके कारण अपयश का भागी बनना पड़ता है. सप्तम भाव पर केतु की दृष्टि जीवनसाथी को कष्ट देता है. जीवनसाथी से सुख एवं सहयोग में कमी लाता है.

कुम्भ लग्न में लग्नस्थ ग्रह
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कुम्भ लग्न का स्वामी शनि है. इस लग्न में सूर्य, शुक्र एवं शनि शुभ कारक ग्रह होते हैं. चन्द्रमा, मंगल, बुध एवं गुरू अशुभ और अकारक ग्रह होते हैं.अगर आपका जन्म कुम्भ लग्न में हुआ है तो प्रथम भाव में स्थित ग्रह आपकी कुण्डली को किस प्रकार प्रभावित करते हैं।

कुम्भ लग्न में लग्नस्थ सूर्य👉 कुम्भ लग्न की कुण्डली में सूर्य सप्तमेश होता है. केन्द्र भाव में स्थित होकर यह शुभ कारक ग्रह का फल देता है. कुम्भ लग्न की कुण्डली में सूर्य अगर लग्नस्थ होता है तो व्यक्ति दिखने में सुन्दर और आत्मविश्वास से परिपूर्ण होता है .स्वास्थ्य सम्बन्धी परेशानियों का सामना करना होता है. सप्तमेश सूर्य लग्नस्थ होने से जीवनसाथी सुन्दर और सहयोगी होता है. यदा कदा आपस में विवाद होता है. मित्रों एवं साझेदारो से सहयोग व लाभ मिलता है. व्यापार एवं कारोबार में जल्दी कामयाबी मिलती है. आर्थिक स्थिति सामान्य रहती है।

कुम्भ लग्न में लग्नस्थ चन्द्र👉 चन्द्र कुम्भ लग्न की कुण्डली में छठे भाव का स्वामी होकर अकारक ग्रह की भूमिका निभाता है. प्रथम भाव में चन्द्र की स्थिति होने से व्यक्ति को सर्दी, खांसी, कफ और पाचन सम्बन्धी रोग होने की संभावना रहती है. चन्द्रमा की इस स्थिति के कारण व्यक्ति का मन चंचल और अशांत रहता है. पारिवारिक जीवन में आपसी कलह और विवाद की संभावना रहती है. चन्द्र की दृष्टि सप्तमस्थ सूर्य की राशि सिंह पर रहती है. इस दृष्टि सम्बन्ध के कारण जीवनसाथी सुन्दर और महत्वाकांक्षी होता है।

कुम्भ लग्न में लग्नस्थ मंगल👉 मंगल कुम्भ लग्न की कुण्डली में तृतीय और दशम भाव का स्वामी होता है. इस लग्न में मंगल अशुभ और अकारक ग्रह की भूमिका निभाता है. मंगल लग्नस्थ होने से व्यक्ति शारीरिक तौर पर सुदृढ़ और बलवान होता है. इनमें साहस और पराक्रम भरपूर होता है. अपनी मेहनत से कठिन से कठिन कार्य को भी पूरा करने की कोशिश करते हैं. पिता एवं पिता पक्ष से इन्हें अनुकूल सहयोग प्राप्त होता है. समाज में सम्मानित और प्रतिष्ठित होते हैं. स्वभाव में उग्रता के कारण अकारण विवादों में भी उलझना पड़ता है. मंगल की दृष्टि पंचम में वृष, सप्तम में सिंह और अष्टम में कन्या राशि पर होने से जीवनसाथी गुणी और व्यवहारिक होता है. वैवाहिक जीवन समान्यत: सुखमय होता है. सप्तमेश और मंगल के पीड़ित अथवा पाप प्रभाव में होने से सप्तम भाव से सम्बन्धित सुख न्यून हो जाता है।

कुम्भ लग्न में लग्नस्थ बुध👉 बुध कुम्भ लग्न की कुण्डली में पंचमेश और अष्टमेश होता है. अष्टमेश होने के कारण यह अकारक और अशुभ फलदायी होता है लग्न में इसकी उपस्थिति होने से व्यक्ति बुद्धिमान और ज्ञानी होता है. शिक्षा के क्षेत्र में इन्हे सफलता मिलती है. वाणी से लोगों को प्रभावित करने की क्षमता होती है. जलक्षेत्र इन्हें बहुत पसंद होता है. नौका विहार एवं जलयात्रा में इन्हें आनन्द मिलता है. अष्टमेश बुध का लग्नस्थ होना रोग कारक होता है. बुध की दशावधि में मानसिक परेशानी और कष्ट की अनुभूति होती है. प्रथमस्थ बुध सप्तम भाव में स्थित सिंह राशि को देखता है फलत: जीवनसाथी से मतभेद और विवाद होता होता है. विवाहेत्तर सम्बन्ध की भी संभावना रहती है।

कुम्भ लग्न में लग्नस्थ गुरू👉 कुम्भ लग्न की कुण्डली मे गुरू अकारक ग्रह होता है. यह द्वितीय और एकादश भाव का स्वामी होता है. लग्न में इसकी उपस्थिति होने से व्यक्ति बुद्धिमान व ज्ञानी होता है. इनमें आत्मबल और आत्मविश्वास होता है. मन अस्थिर और चंचल होता है. गायन और संगीत में अभिरूचि रहती है. वाणी प्रभावशाली होती है. धन संचय की कला में निपुण होते हैं फलत: आर्थिक परेशानियों का सामाना कम ही करना होता है. लग्न में बैठा गुरू पंचम, सप्तम एवं नवम भाव पर दृष्टि डालता है. गुरू की दृष्टि से सगे सम्बन्धियो से लाभ प्राप्त होता है. पिता पक्ष से लाभ मिलता है. संतान एवं जीवनसाथी से सुख प्राप्त होता है।

कुम्भ लग्न में लग्नस्थ शुक्र👉 कुम्भ लग्न की कुण्डली में शुक्र सुखेश और भाग्येश होता है. सुखेश और भाग्येश होने से यह पमुख कारक ग्रह होता है. लग्न की इसकी उपस्थिति होने से व्यक्ति दिखने में सुन्दर और आकर्षक होता है. ये बुद्धिमान और गुणी होते हैं. अध्यात्म में इनकी अभिरूचि होती है. पूजा पाठ एवं धार्मिक कार्यो मे इनकी अभिरूचि होती है. माता से स्नेह और सहयोग प्राप्त होता है. भूमि, भवन एव वाहन का सुख प्राप्त होता है. शुक्र सप्तमस्थ सिंह राशि को देखता है फलत: वैवाहिक जीवन का सुख न्युन होता है. जीवनसाथी से वैमनस्य होता है।

कुम्भ लग्न में लग्नस्थ शनि👉 शनि कुम्भ लग्न की कुण्डली मे लग्नेश और द्वादशेश होकर कारक ग्रह की भूमिका निभाता है. लग्नेश शनि स्वराशि में स्थित होकर व्यक्ति को स्वस्थ और नीरोग काया प्रदान करता है. शनि के प्रभाव से व्यक्ति आत्मविश्वास से परिपूर्ण होता है. अपने व्यक्तित्व एवं आत्मबल के कारण समाज में यश और प्रतिष्ठित होता है. लग्न में बैठा शनि तृतीय भाव में मेष राशि, सप्तम में सिंह राशि एवं दशम में वृश्चिक राशि को देखता है. शनि की दृष्टि से भाईयों से अपेक्षित सहयोग का अभाव होता है. जीवनसाथी से वैमनस्य होता है फलत: वैवाहिक जीवन का सुख प्रभावित होता है।

कुम्भ लग्न में लग्नस्थ राहु👉 प्रथम भाव में अष्टम ग्रह राहु की उपस्थिति से स्वास्थ्य में उतार चढ़ाव होता रहता है. राहु की दशा काल में पेट सम्बन्धी रोग की संभावना रहती है कारोबार एवं व्यापार में कठिनाईयों का सामना करना होता है. व्यवसाय की अपेक्षा नौकरी इन्हें फलती है. लग्नस्थ राहु सप्तम भाव में सूर्य की राशि सिंह को देखता है. शत्रु ग्रह की राशि पर राहु की दृष्टि वैवाहिक जीवन के सुख को मंदा करता है. साझेदारी में इन्हें लाभ मिलने की संभावना कम रहती है. गुप्त विषयो एवं विद्याओ में इनकी रूचि होती है. आत्मविश्वास की कमी के कारण निर्णय लेने में कठिनाई महसूस करते हैं।

कुम्भ लग्न में लग्नस्थ केतु👉 केतु कुम्भ लग्न की कुण्डली में लग्नस्थ होकर व्यक्ति को अस्थिर बनाता है .विपरीत लिंग वाले व्यक्ति में इनकी विशेष अभिरूचि होती है. इनके कई प्रेम प्रसंग होते हैं. भोग विलास में इनका मन रमता है. माता पिता से विवाद और मनमुटाव होने की संभावना रहती है. सप्तम भाव पर केतु की दृष्टि होने से गृहस्थ सुख का अभाव होता है. व्यक्ति के अन्य व्यक्ति से सम्बन्ध के कारण परिवार मे तनाव होता है. केतु के साथ शुभ ग्रहो की युति अथवा दृष्टि सम्बन्ध होने से केतु का अशुभ प्रभाव कम होता है.

लग्नस्थ ग्रहों का प्रभाव मीन लग्न में
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मीन लग्न का स्वामी गुरू होता है. इस लग्न में चन्द्र, मंगल और गुरू कारक ग्रह होते हैं. सूर्य, बुध, शुक्र एवं शनि इस लग्न में अकारक ग्रह बनकर मंदा फल देते हैं.आपका जन्म मीन लग्न मे हुआ है और लग्न में कोई ग्रह है तो उस गह का प्रभाव जीवन पर्यन्त आप पर बना रहेगा.  ग्रहो के अनुरूप मिलने वाला फल इस प्रकार है जैसे.

मीन लग्न में लग्नस्थ सूर्य का प्रभाव👉 सूर्य मीन लग्न की कुण्डली में षष्ठेश होता है. छठे भाव का स्वामी होने से सूर्य अकारक हो जाता है. मीन लग्न में लग्नस्थ होकर सूर्य व्यक्ति को स्वस्थ और नीरोग बनाता है. जिनकी कुण्डली में यह स्थिति होती है वह आत्मविश्वासी और परिश्रमी होते हैं. किसी भी कार्य को पूरे मनोयोग से करते हैं. शत्रुओं और विरोधियो से डरते नहीं हैं. सूर्य की पूर्ण दृष्टि सप्तम भाव में कन्या राशि पर होती है. व्यापार की अपेक्षा नौकरी में इन्हें कामयाबी मिलती है. वैवाहिक जीवन में जीवनसाथी से अनबन के कारण गृहस्थी का सुख प्रभावित होता है.

मीन लग्न में लग्नस्थ चन्द्र का प्रभाव👉 मीन लग्न की कुण्डली में चन्द्रमा पंचमेश होता है. इस लग्न में त्रिकोणेश होने से चन्द्रमा शुभ कारक ग्रह होता है .लग्न में इसकी स्थिति व्यक्ति के लिए सुखद और शुभ होता है. चन्द्रमा के प्रभाव से व्यक्ति सुन्दर और आकर्षक व्यक्तित्व का स्वामी होता है. इनकी वाणी मधुर और प्रभावशाली होती है. इनमें आत्मविश्वास रहता है जिससे किसी भी कार्य से घबराते नहीं हैं. मातृ पक्ष एवं माता से सुख और स्नेह प्राप्त होता है. चन्द्र पूर्ण दृष्टि से बुध की राशि कन्या को देखता है. इसके प्रभाव से जीवनसाथी और संतान पक्ष से सुख एवं सहयोग प्राप्त होता है.

मीन लग्न में लग्नस्थ मंगल का प्रभाव👉 मंगल मीन लग्न की कुण्डली में द्वितीय और नवम भाव का स्वामी होता है. लग्न में इसकी उपस्थिति से व्यक्ति शक्तिशाली और पराक्रमी होता है. यह व्यक्ति को जिद्दी बनाता है. अध्यात्म में इनकी रूचि होती है. दूसरो की मदद करने में आगे रहते हैं. इनकी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ रहती है. धन अपव्यय नहीं करते हैं. इन्हें दृष्टि दोष और कर्ण दोष होने की संभावना रहती है. प्रथम भाव में स्थित मंगल चतुर्थ, सप्तम एवं अष्टम भाव को अपनी दृष्टि से प्रभावित करता है. इसके प्रभाव से मित्रों एवं साझेदारों से लाभ प्राप्त होता है. माता एवं माता समान महिला से स्नेह और सहयोग प्राप्त होता है.

मीन लग्न मे लग्नस्थ बुध का प्रभाव👉 बुध मीन लग्न की कुण्डली में चतुर्थ और सप्तम भाव का स्वामी होकर केन्द्राधिपति दोष से दूषित होता है. लग्न में बुध की उपस्थिति से व्यक्ति परिश्रमी होता है. अपनी मेहनत और बुद्धि के बल पर धन अर्जित करता है. पैतृक सम्पत्ति से इन्हें विशेष लाभ नहीं मिल पाता है. महिलाओं से इन्हें विशेष सहयोग और लाभ मिलता है. लग्न में बैठा बुध सप्तम भाव में अपनी राशि को देखता है. इसके प्रभाव से व्यापार एवं कारोबार में मित्रों एवं साझेदारों से सहयोग प्राप्त होता है. गृहस्थ जीवन सुखमय रहता है. अनुकूल जीवनसाथी प्राप्त होता है जिनसे सहयोग मिलता है.

मीन लग्न में लग्नस्थ गुरू का प्रभाव👉 गुरू मीन लग्न की कुण्डली में लग्नेश और दशमेश होता है. लग्नेश होने के कारण दो केन्द्र भाव का स्वामी होने पर भी इसे केन्द्राधिपति दोष नहीं लगता .लग्न में इसकी उपस्थिति होने से व्यक्ति अत्यंत भाग्यशाली होता है. शारीरिक तौर पर स्वस्थ और सुन्दर होता है. स्वभाव से दयालु और विनम्र रहता है. धर्म के प्रति आस्थावान और आत्मविश्वास से परिपूर्ण रहता है. लग्नस्थ गुरू अपनी पूर्ण दृष्टि से पंचम, सप्तम एवं नवम भाव को देखता है. इसके प्रभाव से पिता एवं संतान से सुख प्राप्त होता है. गृहस्थ जीवन सुखमय होता है।

मीन लग्न में लग्नस्थ शुक्र का प्रभाव👉 शुक्र मीन लग्न की कुण्डली में तृतीय और अष्टम भाव का स्वामी होता है. इस लग्न की कुण्डली में यह अकारक होता है. इस लग्न में शुक्र प्रथम भाव में होने से व्यक्ति सुन्दर और आकर्षक व्यक्तित्व का स्वामी होता है. इन्हें वात रोग होने की संभावना रहती है. अपने काम में ये निपुण होते हैं. ये साहसी और पराक्रमी होते हैं. ये किसी भी चीज़ को गहराई से जाने बिना संतुष्ट नहीं होते. माता से सुख और सहयोग की संभावना कम रहती है. संतान के संदर्भ में कष्ट होता है. सप्तम भाव पर शुक्र की पूर्ण दृष्टि होने से गृहस्थ जीवन समान्यत: सुखमय रहता है।

मीन लग्न में लग्नस्थ शनि का प्रभाव👉 शनि मीन लग्न की कुण्डली में एकादशेश और द्वादशेश होता है. लग्न भाव में शनि की उपस्थिति होने से व्यक्ति दुबला पतला होता है.शनि के प्रभाव से व्यक्ति नेत्र रोग से पीड़ित होता है. इन्हें स्वतंत्र निर्णय लेने में कठिनाई होती है. जीवन में प्रगति हेतु दूसरों से सलाह एवं सहयोग इनके लिए अपेक्षित होता है. धन संचय की प्रवृति होती है. शेयर, सट्टा एवं लांटरी से इन्हें कभी कभी अचानक लाभ मिलता है. लग्नस्थ शनि तृतीय भाव में वृष राशि को, सप्तम भाव मे कन्या राशि को एवं दशम भाव में गुरू की राशि धनु को देखता है. इन भावों में शनि की दृष्टि होने से मित्रों से अपेक्षित लाभ और सहयोग नहीं मिल पाता है. साझेदारों से हानि होती है. दाम्पत्य जीवन में कष्ट की अनुभूति होती है।

मीन लग्न में लग्नस्थ राहु का प्रभाव👉 राहु मीन लग्न की कुण्डली में लग्नस्थ होने से व्यक्ति हृष्ट पुष्ट काया का स्वामी होता है. राहु इन्हें चतुर और चालाक बनाता है. इनमें स्वार्थ की भावना रहती है. अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए ये किसी से मित्रता करते हैं. अपना काम किस प्रकार से निकालना चाहिए इसे अच्छी तरह समझते हैं. इनमें साहस भरपूर होता है. लग्नस्थ राहु सप्तम भाव में स्थित बुध की कन्या राशि को देखता है. इसके प्रभाव से संतान के संदर्भ में कष्ट की संभावना रहती है. जीवनसाथी स्वास्थ्य सम्बन्धी परेशानियों से पीड़ित होता है. गृहस्थी में कठिनाईयों का सामना करना होता है।

मीन लग्न में लग्नस्थ केतु का प्रभाव👉 केतु मीन लग्न की कुण्डली में लग्नस्थ होने से व्यक्ति स्वास्थ सम्बन्धी परेशानियों से पीड़ित होता है. कमर दर्द और वात रोग होने की संभावना रहती है. आत्मविश्वास का अभाव होता है. स्वतंत्र निर्णय लेने में इन्हें कठिनाई होती है. व्यापार की अपेक्षा नौकरी करना इन्हें पंसद होता है. स्वार्थ सिद्धि के लिए सामाजिक नियमों का उलंघन करने से भी परहेज नहीं करते.  सप्तम भाव पर केतु की दृष्टि जीवनसाथी के लिए कष्टकारी होता है. केतु इन्हें विवाहेत्तर सम्बन्ध की ओर प्रेरित करता है फलत: गृहस्थ जीवन का सुख प्रभावित होता है. आर्थिक स्थिति सामान्य होती है।
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