वरुण मुद्रा


वरुण मुद्रा :: चेहरा खिलाये ,झुर्रियां ,चर्म रोग -रक्त विकार मिटाए
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सबसे छोटी उंगली (कनिष्ठिका) को अंगूठे के अग्रभाग से मिलाने पर वरुण मुद्रा बनती है| इस तत्व की कमी से जहां त्वच में रूखापन आता है, वहीं स्वभाव में भी चिड़चिड़ापन बन जाता है| एक अजीब-सा तनाव हमेशा तन-मन में बना रहता है| परिणामस्वरूप अपने सामाजिक ढांचे को भी ऐसा व्यक्ति बिगाड़ लेता है| इसको विपरीत अर्थात् जल तत्व की वृद्धि होने की कल्पना की उड़ान ऊंचाइया छूने लगी हैं| कमी में पहली मुद्रा और अधिकता में दूसरी मुद्रा से लाभ होता है|
कनिष्ठिका को पहले अंगूठे की जड़ में लगाकर फिर अंगूठे से कनिष्ठिका को दबाने से दूसरी मुद्रा बनती है| इसमें बीच की तीन उंगलियां सहज एवं सीधी रहती हैं|
वरुण मुद्रा शरीरमें रूखापन नष्ट करके चिकनाई बढ़ाती है, चमड़ी चमकीली तथा मुलायम बनाती है । चर्म-रोग, रक्त-विकार एवं जल-तत्त्वकी कमीसे उत्पन्न व्याधियोंको दूर करती है । मुँहासोंको नष्ट करती और चेहरेको सुन्दर बनाती है ।
 रूखापन नष्ट, चमड़ी चमकीली व मुलायम, चर्मरोग, रक्त विकार, मुहाँसे एवं जल की कमी वाले रोग दूर होते हैं। दस्त, में लाभ। शरीर में खिंचाव का दर्द ठीक होता है।
सावधानी‌:- कफ-प्रकृतिवाले इस मुद्राका प्रयोग अधिक न करें ।
Varun Mudra: A miracle mudra for Skin problems, wrinkling, loss of glow, dehydration, excessive body heat, blood disorders..........................................................
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